Sarpraj Story

रात...
इतनी गहरी कि मानो स्वयं अंधकार ने संसार को निगल लिया हो।
लेकिन यह पृथ्वी नहीं थी।
यह था—
अनंतलोक।
एक ऐसा ब्रह्मांड जहाँ असंख्य लोक एक अदृश्य ऊर्जा-जाल से जुड़े थे। हर लोक के अपने नियम थे, अपनी प्रजातियाँ थीं, अपनी सभ्यताएँ थीं... और अपने देवतुल्य रहस्य।
उन सभी लोकों के बीच सबसे रहस्यमय माना जाता था—
नागलोक।
किंवदंती थी कि नागलोक केवल साँपों का राज्य नहीं, बल्कि संतुलन की उस प्राचीन शक्ति का संरक्षक है जिसके टूटते ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड विनाश की ओर बढ़ सकता है।
पर उस रात...
संतुलन पहली बार काँप उठा।
आकाश अचानक हरे प्रकाश से भर गया।
पहले एक पतली रेखा दिखाई दी।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
कुछ ही क्षणों में पूरा आकाश मानो लाखों हरी दरारों से फट गया।
धरती काँप उठी।
विशाल पर्वतों के भीतर छिपे ऊर्जा-स्तंभ एक-एक कर जलने लगे।
समुद्रों की लहरें पीछे हट गईं।
जंगलों के जीव भय से भागने लगे।
और नागलोक की राजधानी—
अनंतफण नगरी
में लगे प्राचीन चेतावनी-घंटे स्वयं बज उठे।
ढाँऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽम...
ढाँऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽम...
ढाँऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽम...
सदियों से वे कभी नहीं बजे थे।
महल के सबसे ऊँचे शिखर पर एक वृद्ध खड़ा था।
उसके श्वेत केश हवा में उड़ रहे थे।
आँखों में हजारों वर्षों का अनुभव था।
वह था—
महाऋषि वासुकिर।
उसने आकाश की ओर देखा।
उसकी आँखों में पहली बार भय दिखाई दिया।
धीरे से उसके होंठ हिले—
"यह... असंभव है..."
उसी समय पीछे से कदमों की आवाज़ आई।
एक विशालकाय नाग-योद्धा घुटनों के बल झुक गया।
"गुरुदेव... सीमा पर ऊर्जा-दीवार टूट रही है।"
वासुकिर ने आँखें बंद कर लीं।
"मैं जानता हूँ..."
"तो आदेश दीजिए!"
कुछ क्षण मौन रहा।
फिर वृद्ध ने धीमी आवाज़ में कहा—
"सेना नहीं..."
"उत्तराधिकारी को तैयार करो।"
योद्धा चौंक गया।
"परंतु... वह तो अभी..."
"मैंने जो कहा है वही करो।"
"जी... गुरुदेव।"
उसी समय...
राजधानी से बहुत दूर...
घने, नीले जंगलों के बीच...
एक छोटा-सा गाँव था।
नाम—
शेषवन।
यह गाँव किसी साधारण नक्शे में नहीं मिलता था।
यहाँ रहने वाले लोग स्वयं को योद्धा नहीं कहते थे।
वे स्वयं को कहते थे—
रक्षक।
उनका काम युद्ध करना नहीं...
बल्कि प्राचीन संतुलन की रक्षा करना था।
गाँव के बाहर एक बारह वर्षीय बालक अकेला बैठा था।
उसकी आँखें साधारण नहीं थीं।
उनकी पुतलियाँ क्षण-क्षण में बदलती थीं।
कभी मानव जैसी।
कभी सर्प जैसी।
उसके हाथ में एक लकड़ी की बाँसुरी थी।
वह कोई धुन नहीं बजा रहा था।
बस हवा को सुन रहा था।
उसका नाम था—
सर्पराज।
उसे नहीं पता था कि पूरी दुनिया उसे एक दिन इसी नाम से जानेगी।
उसके लिए वह केवल गाँव का एक जिज्ञासु बालक था।
अचानक...
जंगल के सारे पक्षी एक साथ उड़ गए।
पेड़ों पर बैठे सर्प अपने बिलों से बाहर निकल आए।
हवा का तापमान गिर गया।
सर्पराज ने पहली बार ऐसा दृश्य देखा।
उसने बाँसुरी नीचे रख दी।
"क्या हुआ...?"
उसने धीरे से फुसफुसाया।
तभी उसके सामने ज़मीन पर बैठा एक छोटा हरा साँप तेजी से फन उठाकर आकाश की ओर देखने लगा।
फिर...
उसने पहली बार मानव भाषा में कहा—
"भागो..."
सर्पराज का दिल ज़ोर से धड़क उठा।
"तुम... बोल सकते हो?"
साँप ने उसकी ओर देखा ही नहीं।
वह केवल आकाश देख रहा था।
"भागो..."
"मृत्यु आ रही है..."
सर्पराज कुछ समझ पाता, उससे पहले...
आकाश में हरे रंग का एक विशाल गोला प्रकट हुआ।
उस गोले के भीतर बिजली नहीं...
मानो तरल ज़हर बह रहा था।
फिर...
धड़ाम!!!
वह गोला जंगल से कुछ दूर गिरा।
धरती कई बार काँपी।
हजारों पेड़ टूटकर गिर गए।
हरे प्रकाश की एक लहर पूरे जंगल में फैल गई।
जहाँ-जहाँ वह प्रकाश पहुँचा...
वहाँ की घास काली पड़ने लगी।
पेड़ों की छाल फट गई।
हवा में एक तीखी गंध भर गई।
सर्पराज ने अनायास अपनी नाक ढक ली।
"यह क्या है...?"
उसी समय गाँव की दिशा से लोग भागते हुए आए।
"सब लोग आश्रय में जाओ!"
"कोई बाहर मत रुको!"
"ऊर्जा-वर्षा शुरू हो गई है!"
सर्पराज ने पहली बार यह शब्द सुना—
ऊर्जा-वर्षा।
लेकिन किसी ने उसे समझाने का समय नहीं दिया।
उसी क्षण...
जंगल के भीतर...
जहाँ वह हरा गोला गिरा था...
वहाँ की मिट्टी धीरे-धीरे फटने लगी।
दरारें बढ़ती गईं।
फिर...
उन दरारों के भीतर से एक काला हाथ बाहर निकला।
उस हाथ की त्वचा पर अनगिनत चमकती हुई रेखाएँ थीं।
नाखून किसी तलवार से भी लंबे।
धीरे-धीरे...
एक विशाल आकृति धरती से बाहर निकलने लगी।
उसने पहली साँस ली।
और उसी पल...
आसमान की सारी हरित दरारें कुछ क्षण के लिए शांत हो गईं।
उसने अपनी लाल आँखें खोलीं।
और मुस्कुराया।
"आख़िरकार..."
"हज़ार वर्षों की कैद समाप्त हुई..."
उसे अभी तक किसी ने नहीं देखा था।
न गाँव ने।
न नागलोक ने।
न स्वयं सर्पराज ने।
लेकिन...
उसके जागते ही ब्रह्मांड के सबसे प्राचीन ऊर्जा-स्तंभों में से एक बुझ गया।
और बहुत दूर...
महाऋषि वासुकिर ने काँपती हुई आवाज़ में कहा—
पहली मुहर... टूट चुकी है।
हरे प्रकाश की लहर अभी भी जंगल में फैल रही थी।
शेषवन के लोग भूमिगत आश्रयों की ओर भाग रहे थे।
लेकिन...
सर्पराज वहीं खड़ा था।
उसकी नज़र उस दिशा से हट ही नहीं रही थी जहाँ आकाश से गिरा हुआ हरा अग्निपिंड धरती को चीर चुका था।
"सर्पराज!"
एक कठोर आवाज़ गूँजी।
उसने पीछे मुड़कर देखा।
लगभग पचास वर्ष का एक बलशाली पुरुष उसकी ओर दौड़ता आ रहा था।
उसके कंधे पर दोधारी भाला था और छाती पर गहरे नीले रंग का चिन्ह अंकित था।
वह था—
आर्यकेतु
शेषवन का प्रधान रक्षक।
"तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"
"सब लोग आश्रय में जा चुके हैं!"
सर्पराज ने काँपती आवाज़ में पूछा—
"गुरुजी... वह आकाश में क्या था?"
आर्यकेतु ने उत्तर देने के बजाय उसकी कलाई पकड़ ली।
"चलो!"
"अभी प्रश्न पूछने का समय नहीं है।"
उसी समय...
वही छोटा हरा साँप फिर सर्पराज के पैरों के पास आ गया।
इस बार उसने सीधे सर्पराज की ओर देखा।
उसकी आँखों में भय था।
"मत जाओ..."
"वह तुम्हें महसूस कर चुका है..."
सर्पराज का चेहरा पीला पड़ गया।
"कौन...?"
लेकिन साँप ने उत्तर नहीं दिया।
वह बिजली की गति से झाड़ियों में गायब हो गया।
आर्यकेतु ने कुछ भी नहीं सुना।
मानो साँप की आवाज़ केवल सर्पराज तक ही पहुँची हो।
दोनों आश्रय की ओर बढ़ ही रहे थे कि अचानक...
धड़ाम!
धरती फिर काँपी।
इस बार पहले से भी अधिक।
दूर जंगल की दिशा से धुएँ का एक काला स्तंभ उठने लगा।
उसके भीतर हरे रंग की बिजली चमक रही थी।
लेकिन वह सामान्य बिजली नहीं थी।
वह मानो जीवित थी।
उसी क्षण...
नागलोक।
अनंतफण नगरी।
राजमहल के नीचे स्थित शून्य सभागार में पहली बार आपातकालीन सभा बुलाई गई।
सभागार गोलाकार था।
उसकी दीवारों पर हज़ारों वर्ष पुराने जीवित शिलालेख साँस लेते हुए प्रतीत होते थे।
बीच में एक विशाल वृत्त था।
वहाँ सात सिंहासन थे।
लेकिन...
सिर्फ़ छह पर लोग बैठे थे।
सातवाँ सिंहासन खाली था।
महाऋषि वासुकिर धीरे-धीरे उस खाली सिंहासन की ओर बढ़े।
उन्होंने उसे देखा...
और बोले—
"जिस दिन यह सिंहासन फिर भरेगा..."
"उसी दिन ब्रह्मांड का संतुलन अंतिम परीक्षा में प्रवेश करेगा।"
पूरा सभागार मौन हो गया।
एक युवा सेनापति खड़ा हुआ।
"गुरुदेव, क्या पहली मुहर सचमुच टूट चुकी है?"
वासुकिर ने उत्तर दिया—
"हाँ।"
"और यदि दूसरी मुहर भी टूट गई..."
"...तो केवल नागलोक नहीं..."
"...सभी लोक संकट में पड़ जाएँगे।"
एक वृद्ध महिला, जिनकी आँखों पर रजत पट्टी बँधी थी, बोलीं—
"तो भविष्यवाणी सत्य थी..."
वासुकिर ने सिर झुका लिया।
"हमने उसे केवल कथा समझा..."
"पर वह इतिहास बनने जा रही है।"
उधर...
शेषवन।
आश्रय के द्वार बंद हो चुके थे।
सैकड़ों लोग भीतर इकट्ठा थे।
बच्चे रो रहे थे।
बुज़ुर्ग प्रार्थना कर रहे थे।
लेकिन सर्पराज की आँखें लगातार ऊपर बनी पत्थर की छत को देख रही थीं।
उसे अजीब-सी धड़कन महसूस हो रही थी।
मानो कोई उसे पुकार रहा हो।
बहुत दूर से...
बहुत गहराई से...
"आओ..."
"मुझे खोजो..."
उसने घबराकर अपने कान बंद कर लिए।
आवाज़ फिर भी बंद नहीं हुई।
आर्यकेतु ने यह देखकर पूछा—
"क्या हुआ?"
सर्पराज ने हिचकते हुए कहा—
"कोई... मुझे बुला रहा है।"
आश्रय में अचानक सन्नाटा छा गया।
आर्यकेतु का चेहरा बदल गया।
"क्या कहा तुमने?"
"आवाज़... कैसी है?"
"समझ नहीं आ रहा... लेकिन वह मुझे नाम से नहीं बुला रही..."
"...फिर भी लगता है कि वह मुझे ही बुला रही है।"
आर्यकेतु ने तुरंत वहाँ मौजूद सभी लोगों की ओर देखा।
"कोई भी इस बात का ज़िक्र बाहर नहीं करेगा।"
उनकी आवाज़ में ऐसा भय था जिसे सर्पराज ने पहले कभी नहीं देखा था।
उसी समय...
जंगल के उस गड्ढे में...
जहाँ से काली आकृति निकली थी...
वह धीरे-धीरे सीधी खड़ी हुई।
उसने अपनी हथेली आकाश की ओर उठाई।
हवा में तैरती हरी ऊर्जा उसकी उँगलियों के चारों ओर घूमने लगी।
वह मुस्कुराया।
"मुहर कमज़ोर हो चुकी है..."
"अब मुझे केवल..."
"...उस उत्तराधिकारी को ढूँढ़ना है।"
उसकी लाल आँखें अचानक शेषवन की दिशा में उठीं।
कुछ क्षण...
वह बिना पलक झपकाए उसी ओर देखता रहा।
फिर उसके होंठों पर एक ठंडी मुस्कान उभरी।
"तो... तुम जीवित हो।"
उसी पल...
आश्रय के भीतर बैठे सर्पराज ने अचानक अपना सिर उठा लिया।
उसे लगा...
मानो किसी ने अंधकार के पार से सीधे उसकी आँखों में देखा हो।
उसकी साँसें तेज़ हो गईं।
बिना किसी कारण उसकी हथेली पर एक पतली, चमकती हुई हरी रेखा उभर आई...
और अगले ही पल गायब हो गई।
सर्पराज ने काँपते हुए अपनी हथेली को देखा।
"यह... क्या था?"
किसी के पास उत्तर नहीं था।
लेकिन उसी क्षण...
नागलोक के सबसे प्राचीन मंदिर में रखा काल-शिला पहली बार स्वयं प्रकाशित हो उठा।
महाऋषि वासुकिर ने उसे देखकर केवल एक वाक्य कहा—
"वह जाग चुका है..."
रात बीत चुकी थी।
लेकिन सूर्योदय नहीं हुआ।
पूरा आकाश धूसर था।
सूर्य कहीं था...
पर उसकी किरणें मानो किसी अदृश्य परदे के पीछे कैद हो गई थीं।
शेषवन के लोगों ने ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा था।
गाँव में पहली बार...
सन्नाटा डर से भी भारी था।
भूमिगत आश्रय का विशाल पत्थर-द्वार धीरे-धीरे खोला गया।
आर्यकेतु सबसे पहले बाहर निकले।
उनके पीछे पाँच रक्षक।
फिर गाँव के लोग।
जैसे ही सभी बाहर आए...
हर किसी की साँस थम गई।
पूरा जंगल बदल चुका था।
जहाँ कल तक हरे-भरे वृक्ष थे...
वहाँ अब काले पड़ चुके तने खड़े थे।
घास राख जैसी हो चुकी थी।
हवा में एक अजीब धातु जैसी गंध थी।
और सबसे विचित्र बात...
जंगल में एक भी पक्षी नहीं था।
एक भी आवाज़ नहीं।
मानो पूरा वन जीवित होकर भी मर चुका हो।
"सभी लोग गाँव की सीमा से बाहर नहीं जाएँगे!"
आर्यकेतु ने ऊँची आवाज़ में आदेश दिया।
"कोई भी अकेले जंगल में कदम नहीं रखेगा।"
लोग बिना विरोध किए सिर झुकाकर खड़े रहे।
क्योंकि वे भी समझ चुके थे—
यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं थी।
उधर...
सर्पराज चुपचाप अपनी हथेली देख रहा था।
वही हथेली...
जिस पर रात को चमकती हरी रेखा उभरी थी।
अब वहाँ कुछ भी नहीं था।
"क्या मैंने सपना देखा था...?"
उसने मन ही मन सोचा।
तभी...
उसे फिर वही फुसफुसाहट सुनाई दी।
"उत्तर... जंगल में है..."
वह झटके से पीछे मुड़ा।
कोई नहीं था।
"सर्पराज!"
आर्यकेतु की आवाज़ आई।
"मेरे साथ चलो।"
इस बार उनकी आवाज़ पहले जैसी कठोर नहीं थी।
उसमें एक अजीब गंभीरता थी।
वे दोनों गाँव के बीच बने एक प्राचीन पत्थर-मंदिर की ओर बढ़े।
सर्पराज वहाँ कई बार आया था।
लेकिन...
आज पहली बार मंदिर का मुख्य द्वार खुला था।
बचपन से उसे बताया गया था—
"यह स्थान केवल रक्षकों के लिए है।"
मंदिर के भीतर घुप्प अंधेरा था।
दीवारों पर उकेरे गए विशाल सर्पों की आकृतियाँ मशालों की रोशनी में जीवित-सी लग रही थीं।
मंदिर के सबसे भीतर...
एक गोलाकार कक्ष था।
उसके बीचोंबीच पत्थर का एक स्तंभ खड़ा था।
स्तंभ पर अनगिनत नाम खुदे थे।
सर्पराज ने पूछा—
"ये किसके नाम हैं?"
आर्यकेतु ने धीरे से उत्तर दिया—
"उन लोगों के..."
"...जिन्होंने संतुलन की रक्षा करते हुए अपना जीवन दिया।"
कुछ पल बाद...
उन्होंने स्तंभ के नीचे बने एक छोटे से खाँचे में अपना हाथ रखा।
घर्र... घर्र...
पूरा फ़र्श काँप उठा।
पत्थर की एक गुप्त सीढ़ी नीचे उतरने लगी।
सर्पराज की आँखें फैल गईं।
"यह... यहाँ था?"
आर्यकेतु ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।
"कुछ रास्ते केवल सही समय पर खुलते हैं।"
दोनों नीचे उतरने लगे।
सीढ़ियाँ समाप्त हुईं।
उनके सामने एक विशाल भूमिगत कक्ष था।
सैकड़ों अलमारियाँ।
हज़ारों ताड़पत्र।
धूल से ढकी धातु की पेटियाँ।
और बीच में...
एक अकेला पत्थर का आसन।
उस पर सफेद वस्त्र पहने एक अत्यंत वृद्ध व्यक्ति ध्यान में बैठे थे।
उनकी साँस इतनी धीमी थी कि वे जीवित हैं या नहीं, समझना कठिन था।
आर्यकेतु तुरंत घुटनों के बल बैठ गए।
"आचार्य..."
वृद्ध ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।
उनकी आँखों की पुतलियाँ...
सुनहरी थीं।
उन्होंने सीधे सर्पराज की ओर देखा।
काफी देर तक।
फिर बहुत धीमे बोले—
"तो समय आ ही गया..."
सर्पराज ने आश्चर्य से पूछा—
"आप मुझे जानते हैं?"
वृद्ध मुस्कुराए।
"तुम्हें..."
"तुम्हारे जन्म से पहले से।"
यह सुनते ही सर्पराज के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
आचार्य ने अपने पास रखी एक छोटी धातु की पेटी उठाई।
पेटी पर सात ताले बने थे।
लेकिन उन्होंने कोई चाबी नहीं निकाली।
उन्होंने केवल अपनी हथेली उस पर रखी।
सभी सात ताले स्वयं खुल गए।
पेटी के भीतर...
एक कपड़े में लिपटी हुई वस्तु रखी थी।
उन्होंने उसे सावधानी से खोला।
उसमें एक छोटा-सा काला लटकन (Pendant) था।
उसके बीच में एक चमकती हुई हरी रेखा बनी थी।
सर्पराज की साँस रुक गई।
वही निशान...
जो रात उसकी हथेली पर उभरा था।
"यह..."
उसके मुँह से शब्द ही नहीं निकले।
आचार्य ने लटकन उसकी ओर बढ़ाया।
"यह तुम्हारा है।"
आर्यकेतु चौंक उठे।
"आचार्य! अभी नहीं!"
वृद्ध ने उनकी ओर देखे बिना कहा—
"अब देर हो चुकी है।"
"यह लटकन..."
आचार्य ने कहना शुरू किया,
"...तुम्हारे साथ उस रात मिला था..."
सर्पराज ने विस्मय से पूछा—
"कौन-सी रात?"
वृद्ध की आँखें गहरी हो गईं।
"जिस रात शेषवन के द्वार पर एक अज्ञात व्यक्ति तुम्हें छोड़कर गायब हो गया था।"
सर्पराज का दिल मानो धड़कना भूल गया।
"क्या...?"
"मैं..."
"...क्या मैं इस गाँव में पैदा नहीं हुआ?"
कक्ष में फिर सन्नाटा छा गया।
आर्यकेतु ने आँखें बंद कर लीं।
आचार्य ने धीरे से कहा—
"नहीं, सर्पराज..."
"तुम शेषवन के पुत्र नहीं हो।"
उसी क्षण...
बहुत दूर...
काले जंगल के बीच...
वह रहस्यमयी सत्ता एक जले हुए वृक्ष के सामने खड़ी थी।
उसने हवा को सूँघा।
फिर उसकी मुस्कान और गहरी हो गई।
"मैंने तुम्हें ढूँढ़ लिया..."
उसने शेषवन की दिशा में कदम बढ़ाया।
उसके हर कदम के साथ...
धरती पर काली दरारें बनती जा रही थीं।
भूमिगत कक्ष में ऐसी खामोशी छा गई थी कि मशाल की लौ की हल्की-सी आवाज़ भी स्पष्ट सुनाई दे रही थी।
सर्पराज की आँखें आचार्य पर टिकी थीं।
उसके मन में एक ही प्रश्न बार-बार गूँज रहा था—
"अगर मैं शेषवन का नहीं हूँ... तो मैं हूँ कौन?"
आचार्य ने धीरे-धीरे वह काला लटकन उसकी हथेली पर रख दिया।
जैसे ही लटकन ने उसकी त्वचा को छुआ...
एक तीव्र कंपन उसके पूरे शरीर में दौड़ गया।
उसकी आँखों के सामने सब कुछ धुँधला पड़ने लगा।
उसे लगा जैसे वह उसी कक्ष में नहीं है।
अचानक...
उसने स्वयं को एक अजनबी स्थान पर खड़ा पाया।
चारों ओर अग्नि थी।
आकाश लाल था।
विशाल सर्पाकार स्तंभ टूट रहे थे।
हजारों योद्धा युद्ध कर रहे थे।
लेकिन उनके चेहरे धुँधले थे।
एक स्त्री किसी शिशु को अपनी छाती से लगाए भाग रही थी।
उसकी आँखों में आँसू थे।
उसके पीछे काले कवच पहने योद्धाओं का समूह था।
वह बार-बार पीछे मुड़कर देख रही थी।
फिर उसने उस शिशु के गले में वही काला लटकन बाँधा...
और काँपती आवाज़ में कहा—
"जब तक यह चिन्ह सुरक्षित है..."
"आशा जीवित है..."
अगले ही पल—
पूरा दृश्य टूटकर बिखर गया।
"आऽऽह!"
सर्पराज ज़ोर से चीखा और घुटनों के बल गिर पड़ा।
उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं।
माथे पर पसीना था।
आचार्य और आर्यकेतु तुरंत उसकी ओर बढ़े।
"तुमने क्या देखा?"
कुछ क्षण तक वह बोल ही नहीं पाया।
फिर धीमी आवाज़ में बोला—
"एक... स्त्री..."
"...वह मुझे बचा रही थी..."
"और..."
"...पूरा एक नगर जल रहा था..."
आचार्य की सुनहरी आँखों में चिंता उतर आई।
उन्होंने मन ही मन कुछ सोचा।
"इतनी जल्दी स्मृति का जागना... यह अपेक्षित नहीं था..."
"क्या वह मेरी... माँ थी?"
सर्पराज ने काँपते हुए पूछा।
आचार्य ने सीधे उत्तर नहीं दिया।
"जिस दिन सत्य सुनने की तुम्हारी शक्ति होगी..."
"उस दिन तुम्हें पूरा उत्तर मिलेगा।"
सर्पराज की आँखों में पहली बार क्रोध चमका।
"कब?"
"मुझसे हमेशा सच क्यों छिपाया गया?"
आचार्य मौन रहे।
लेकिन आर्यकेतु आगे आए।
"क्योंकि सच तुम्हारी रक्षा कर रहा था।"
"रक्षा?"
सर्पराज ने तीखी आवाज़ में कहा।
"झूठ बोलकर?"
आर्यकेतु ने पहली बार उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा—
"हाँ।"
"क्योंकि जिस दिन तुम्हारी पहचान दुनिया के सामने आ जाएगी..."
"...उसी दिन तुम्हारा शिकार शुरू हो जाएगा।"
इतने में...
ठक...
ठक...
ठक...
भूमिगत कक्ष की छत हल्के-हल्के काँपने लगी।
आर्यकेतु तुरंत सतर्क हो गए।
"यह क्या था?"
फिर एक और आवाज़ आई।
इस बार पहले से अधिक भारी।
धड़ाम!
ऊपर कहीं विशाल पत्थर टूटने की गूँज सुनाई दी।
एक युवा रक्षक हाँफता हुआ सीढ़ियों से नीचे भागा।
उसके चेहरे पर दहशत साफ़ दिखाई दे रही थी।
"प्रधान रक्षक!"
"गाँव की... गाँव की बाहरी रक्षा-रेखा..."
"...टूट गई!"
आर्यकेतु का चेहरा कठोर हो गया।
"कैसे?"
रक्षक की आवाज़ काँप रही थी।
"हमें कुछ दिखाई नहीं दिया..."
"लेकिन पहरेदार... एक-एक करके गायब हो रहे हैं।"
उसी समय...
शेषवन की सीमा पर...
घना कोहरा फैल चुका था।
उस कोहरे के बीच एक काली आकृति धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।
उसके पैरों की आहट तक नहीं थी।
हर कदम के साथ...
पेड़ों की छाल राख बनती जा रही थी।
अचानक...
एक प्रहरी उसके सामने आ गया।
"कौन हो तुम?"
कोई उत्तर नहीं मिला।
प्रहरी ने भाला तान दिया।
"रुको!"
अगले ही क्षण...
उसने केवल इतना महसूस किया कि उसके चारों ओर की हवा बर्फ जैसी ठंडी हो गई है।
फिर...
उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
जब दूसरा प्रहरी वहाँ पहुँचा...
तो उसे केवल ज़मीन पर पड़ा हुआ खाली कवच मिला।
उसके भीतर...
कोई शरीर नहीं था।
भूमिगत कक्ष में...
आचार्य अचानक खड़े हो गए।
उन्होंने अपनी हथेली पत्थर की दीवार पर रखी।
उनकी आँखें बंद हो गईं।
कुछ क्षण बाद उन्होंने धीरे से कहा—
"वह गाँव के भीतर आ चुका है..."
आर्यकेतु ने तलवार खींच ली।
"कौन?"
आचार्य ने उत्तर दिया—
"जिसे हज़ार वर्ष पहले पहली मुहर के साथ कैद किया गया था..."
"और..."
उन्होंने सर्पराज की ओर देखा।
"...वह यहाँ किसी वस्तु के लिए नहीं आया।"
"...वह तुम्हारे लिए आया है।"
सर्पराज के हाथ में पकड़ा काला लटकन अचानक हल्की हरी रोशनी से चमक उठा।
और उसी पल...
भूमिगत कक्ष के सबसे अंत में स्थित विशाल पत्थर का द्वार...
अपने आप...
धीरे-धीरे खुलने लगा।
उसके पीछे केवल अंधकार था।
लेकिन उस अंधकार से एक ऐसी ऊर्जा निकल रही थी...
जिसे देखकर स्वयं आचार्य के चेहरे का रंग उड़ गया।
उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा—
"नहीं... यह द्वार अभी नहीं खुलना चाहिए था..."
पत्थर का विशाल द्वार...
धीरे-धीरे खुलता जा रहा था।
घर्र... घर्र...
उसकी आवाज़ पूरे भूमिगत परिसर में गूँज रही थी।
सैकड़ों वर्षों की जमी धूल हवा में फैल गई।
मशालों की लौ एक-एक करके काँपने लगी।
मानो स्वयं प्रकाश भी उस अंधकार से भयभीत हो।
आचार्य के चेहरे पर पहली बार घबराहट साफ़ दिखाई दे रही थी।
"पीछे हट जाओ!"
उन्होंने ऊँची आवाज़ में आदेश दिया।
सभी रक्षक तुरंत पीछे हट गए।
लेकिन...
सर्पराज वहीं खड़ा रहा।
उसकी नज़र उस द्वार पर जमी हुई थी।
उसे ऐसा महसूस हो रहा था...
मानो द्वार के पीछे कोई उसे पहचानता हो।
फिर...
वह आवाज़ आई।
इस बार पहले से अधिक स्पष्ट।
"आ गए..."
"मैं बहुत समय से प्रतीक्षा कर रहा था..."
सर्पराज ने अनायास उत्तर दिया—
"कौन हो तुम?"
पूरे कक्ष में सन्नाटा छा गया।
आर्यकेतु ने उसकी ओर देखा।
"तुम किससे बात कर रहे हो?"
सर्पराज ने विस्मित होकर कहा—
"आपने नहीं सुना?"
आचार्य की आँखें सिकुड़ गईं।
उन्होंने धीमे स्वर में कहा—
"आवाज़ केवल उसी तक पहुँच रही है..."
"...जिसके लिए यह द्वार खुला है।"
द्वार पूरी तरह खुल गया।
लेकिन उसके पीछे कोई कमरा नहीं था।
वहाँ केवल...
असीम अंधकार।
इतना गहरा कि मशाल की रोशनी भी उसमें प्रवेश करते ही गायब हो रही थी।
फिर उस अंधकार के भीतर...
धीरे-धीरे...
सैकड़ों हरी आँखें खुलने लगीं।
एक...
दो...
दस...
पचास...
सैकड़ों...
वे सब एक साथ सर्पराज को देख रही थीं।
एक युवा रक्षक भय से काँप उठा।
"ये... ये क्या हैं?"
अचानक...
सारी आँखें एक साथ बंद हो गईं।
और अंधकार से एक भारी आवाज़ गूँजी—
"अभी नहीं..."
"उसका समय अभी नहीं आया..."
अगले ही क्षण...
पूरा अंधकार सिकुड़ने लगा।
हरी आँखें गायब हो गईं।
पत्थर का द्वार स्वयं बंद होने लगा।
धड़ाम!
द्वार फिर से अपनी जगह पर बंद हो गया।
मानो कुछ हुआ ही न हो।
कई क्षण तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर आचार्य ने गहरी साँस ली।
"उसने..."
"...हमें चेतावनी दी है।"
आर्यकेतु ने पूछा—
"कौन?"
आचार्य ने सिर हिलाया।
"उसका नाम..."
"...आज भी लेना वर्जित है।"
उसी समय...
शेषवन की बाहरी सीमा।
घना कोहरा पूरे गाँव को घेर चुका था।
रक्षक मशालें लेकर खोज कर रहे थे।
तभी...
एक बच्चा चिल्लाया।
"उधर!"
सभी दौड़े।
लेकिन वहाँ केवल...
मिट्टी पर बना एक विशाल चिन्ह था।
वह चिन्ह किसी साँप जैसा नहीं था।
न किसी ज्ञात भाषा का प्रतीक।
उसके बीचोंबीच वही हरी रेखा बनी थी...
जो सर्पराज के लटकन पर थी।
आर्यकेतु भी वहाँ पहुँचे।
उन्होंने जैसे ही वह चिन्ह देखा...
उनके हाथ से तलवार लगभग छूट गई।
उन्होंने तुरंत मिट्टी पर कपड़ा डाल दिया।
"कोई इसे नहीं देखेगा!"
एक रक्षक ने पूछा—
"क्या यह शत्रु का निशान है?"
आर्यकेतु ने उत्तर नहीं दिया।
लेकिन उनके मन में केवल एक विचार था—
"इतिहास स्वयं को दोहरा रहा है..."
उधर...
काला अजनबी एक ऊँची पहाड़ी पर खड़ा शेषवन को देख रहा था।
उसकी आँखों में अब क्रोध नहीं था।
केवल धैर्य।
उसने अपने हाथ की उँगलियों से हवा में एक वृत्त बनाया।
वृत्त के भीतर धुएँ जैसी छवि उभरी।
उसमें सात पत्थर के स्तंभ दिखाई दिए।
उनमें से...
एक स्तंभ पूरी तरह टूट चुका था।
दूसरे स्तंभ पर एक पतली दरार उभर आई।
अजनबी मुस्कुराया।
"पहली मुहर टूट चुकी है..."
"दूसरी... स्वयं खुल जाएगी।"
फिर उसने धीरे से एक नाम लिया।
लेकिन वह नाम हवा में घुल गया।
पाठक उसे सुन नहीं पाए।
उसी क्षण...
नागलोक।
महाऋषि वासुकिर अकेले काल-शिला के सामने खड़े थे।
काल-शिला की सतह पर पहली बार एक बालक की धुँधली आकृति दिखाई दी।
वह आकृति...
सर्पराज की थी।
वासुकिर ने काँपते हुए हाथ जोड़ लिए।
धीरे से बोले—
"यदि भविष्यवाणी का यही मार्ग है..."
"तो अब उसे छिपाकर नहीं बचाया जा सकता।"
उन्होंने पीछे खड़े दूत की ओर देखा।
"तुरंत..."
"...सप्त-रक्षकों को संदेश भेजो।"
दूत चौंक गया।
"सभी सातों को?"
वासुकिर ने गंभीर स्वर में कहा—
"हाँ।"
"क्योंकि खेल शुरू हो चुका है।"
उसी समय...
सर्पराज अपने कक्ष में अकेला बैठा था।
उसने फिर उस काले लटकन को हाथ में लिया।
इस बार...
लटकन के भीतर से हल्की धड़कन महसूस हुई।
मानो...
वह कोई निर्जीव वस्तु नहीं...
बल्कि जीवित हो।
सर्पराज ने धीरे से फुसफुसाया—
"तुम... आखिर हो क्या?"
और उसी क्षण...
लटकन की हरी रेखा एक पल के लिए चमकी...
फिर उसके सामने ज़मीन पर एक बेहद छोटा, चमकता हुआ नक्शा उभर आया।
नक्शे पर एक स्थान लाल रंग से चमक रहा था...
जिसके नीचे केवल दो शब्द लिखे थे—
"विस्मृत द्वार"

सर्पराज

एपिसोड 2 — "विस्मृत द्वार की पुकार"

रात गहरी थी।
शेषवन सो रहा था...
लेकिन एक व्यक्ति जाग रहा था।
सर्पराज।
उसकी हथेली में रखा काला लटकन हल्की-हल्की धड़क रहा था।
हर धड़कन के साथ ज़मीन पर बना वह प्रकाशमय नक्शा थोड़ा स्पष्ट हो जाता।
नक्शे में केवल एक लाल बिंदु था।
उसके नीचे लिखा था—
"विस्मृत द्वार"
सर्पराज ने उँगली से उस स्थान को छूने की कोशिश की।
जैसे ही उसकी उँगली प्रकाश से टकराई...
पूरा नक्शा लहराने लगा।
फिर अचानक...
एक नया चिन्ह प्रकट हुआ।
वह लाल बिंदु धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था।
सर्पराज की साँस अटक गई।
"यह... चल रहा है?"
कुछ पल तक वह देखता रहा।
फिर उसे समझ आया—
नक्शा नहीं बदल रहा था...
कुछ उस द्वार की ओर बढ़ रहा था।
उसी समय...
शेषवन की सबसे ऊँची प्रहरी-मीनार पर आर्यकेतु खड़े थे।
उनके सामने दस श्रेष्ठ रक्षक उपस्थित थे।
"आज से गाँव की सीमा तीन गुना बढ़ा दी जाएगी।"
"कोई भी अकेला गश्त नहीं करेगा।"
"यदि जंगल में हरी रोशनी दिखाई दे..."
"...तो लड़ना नहीं।"
एक युवा रक्षक चौंका।
"लड़ना नहीं?"
"लेकिन हम रक्षक हैं!"
आर्यकेतु ने उसकी ओर देखा।
"रक्षक होने और मूर्ख होने में अंतर होता है।"
"जिस शत्रु को हम पहचानते ही नहीं..."
"...उससे युद्ध नहीं किया जाता।"
उधर...
भूमिगत कक्ष में...
आचार्य अकेले बैठे थे।
उनके सामने ताड़पत्रों का ढेर खुला था।
वे एक-एक पन्ना पलट रहे थे।
अचानक...
उन्हें एक अत्यंत पुराना चित्र दिखाई दिया।
चित्र में सात विशाल स्तंभ बने थे।
उनके नीचे एक वाक्य लिखा था—
"जब पहली मुहर टूटेगी, तब उत्तराधिकारी स्वयं द्वार खोजेगा।"
आचार्य का चेहरा गंभीर हो गया।
"तो भविष्यवाणी का यह भाग भी सत्य था..."
उन्होंने तुरंत ताड़पत्र बंद कर दिया।
"अब समय हमारे विरुद्ध चल रहा है।"
इसी बीच...
नागलोक।
अनंतफण नगरी।
महाऋषि वासुकिर के आदेश पर संदेशवाहक सातों दिशाओं में निकल चुके थे।
उनका लक्ष्य था—
सप्त-रक्षक।
ये वे योद्धा थे जिनके बारे में सामान्य नाग भी नहीं जानते थे।
उनका अस्तित्व स्वयं एक रहस्य था।
और अब...
हज़ार वर्षों बाद...
उन्हें फिर बुलाया गया था।
उसी समय...
एक बर्फ़ीले लोक की ऊँची चट्टान पर...
एक अकेली स्त्री ध्यान में बैठी थी।
उसके चारों ओर बर्फ़ का तूफ़ान चल रहा था।
लेकिन उसकी साँसें पूरी तरह स्थिर थीं।
अचानक...
उसके सामने हरे प्रकाश का एक छोटा सर्प प्रकट हुआ।
उसने बिना शब्दों के संदेश पहुँचा दिया।
स्त्री ने आँखें खोलीं।
उसकी नीली आँखों में क्षणभर आश्चर्य उभरा।
फिर उसने केवल एक वाक्य कहा—
"यदि वासुकिर ने मुझे बुलाया है..."
"...तो पहली मुहर सचमुच टूट चुकी है।"
वह उठी...
और बिना पीछे देखे बर्फ़ीले तूफ़ान के भीतर गायब हो गई।
उधर...
शेषवन।
सर्पराज अब भी नक्शे को देख रहा था।
उसे लग रहा था कि कोई अदृश्य शक्ति उसे जंगल की ओर खींच रही है।
उसी समय...
वही छोटा हरा साँप फिर खिड़की पर आकर बैठ गया।
इस बार उसकी साँसें तेज़ थीं।
"समय नहीं है..."
सर्पराज तुरंत उसकी ओर बढ़ा।
"तुम कौन हो?"
साँप ने पहली बार उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा—
"मैं तुम्हारा उत्तर नहीं..."
"...तुम्हारी चेतावनी हूँ।"
सर्पराज कुछ पूछ पाता, उससे पहले ही साँप ने अपना फन जंगल की ओर घुमा दिया।
"वह..."
"...द्वार तक पहुँचने वाला पहला व्यक्ति नहीं है।"
सर्पराज का दिल ज़ोर से धड़का।
"कौन?"
साँप ने धीरे से कहा—
"जिसने पहली मुहर तोड़ी..."
"...वह दूसरी मुहर खोज चुका है।"
उसी क्षण...
जंगल के सबसे अंधेरे भाग में...
वह रहस्यमयी काली आकृति एक विशाल पत्थर के सामने खड़ी थी।
पत्थर पर वही चिन्ह उकेरा था जो सर्पराज के लटकन पर था।
उसने अपना हाथ उस चिन्ह पर रखा।
एक क्षण...
कुछ नहीं हुआ।
फिर...
पत्थर के भीतर से हरी रेखाएँ फैलने लगीं।
लेकिन उसी पल...
पत्थर से निकली एक अदृश्य शक्ति ने उसे कई कदम पीछे धकेल दिया।
उसकी मुस्कान गायब हो गई।
पहली बार उसके चेहरे पर क्रोध दिखाई दिया।
"अभी भी..."
"...उत्तराधिकारी की अनुमति आवश्यक है?"
उसने मुट्ठी भींच ली।
"तो फिर..."
"...मैं स्वयं उत्तराधिकारी को द्वार तक ले आऊँगा।"
उसकी लाल आँखें सीधे शेषवन की ओर उठीं।
उसी समय...
सर्पराज के हाथ का काला लटकन अचानक गर्म हो गया।
नक्शे पर एक नई रेखा उभरी।
वह रेखा...
सीधे शेषवन से निकलकर उसी "विस्मृत द्वार" तक जा रही थी।
सर्पराज समझ गया—
यह कोई संयोग नहीं था।
द्वार उसे बुला रहा था।
और शायद...
कोई दूसरा भी।
रात का अंतिम पहर...
पूरा शेषवन गहरी नींद में डूबा हुआ था।
लेकिन सर्पराज की आँखों में नींद नहीं थी।
उसकी हथेली में रखा काला लटकन हर कुछ क्षण बाद हल्का-सा चमक उठता।
हर बार चमकने पर नक्शे की लाल रेखा पहले से अधिक स्पष्ट हो जाती।
मानो कोई अदृश्य शक्ति कह रही हो—
"देर मत करो..."
सर्पराज ने धीरे से अपने कमरे का द्वार खोला।
बाहर पूर्ण सन्नाटा था।
हवा भी असामान्य रूप से स्थिर थी।
जैसे पूरा गाँव किसी अनजाने भय में साँस रोककर बैठा हो।
वह बिना आवाज़ किए आगे बढ़ा।
गाँव की आख़िरी झोपड़ी पार करते ही उसके सामने एक पुराना पत्थर का स्तंभ दिखाई दिया।
उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था—
"इस सीमा के आगे रक्षक भी अनुमति लेकर ही जाएँ।"
सर्पराज ने बचपन से यह स्तंभ देखा था...
लेकिन कभी इसके आगे जाने की अनुमति नहीं मिली।
आज...
वह रुक गया।
उसने पीछे मुड़कर गाँव की ओर देखा।
फिर धीरे से फुसफुसाया—
"अगर उत्तर वहीं है..."
"...तो मुझे जाना ही होगा।"
और उसने सीमा पार कर दी।
जैसे ही उसका पहला कदम निषिद्ध वन में पड़ा...
चारों ओर की हवा बदल गई।
जंगल पहले से कहीं अधिक शांत था।
इतना शांत...
कि अपने दिल की धड़कन तक सुनाई दे रही थी।
तभी...
उसके हाथ का लटकन तेज़ी से चमकने लगा।
सामने की झाड़ियों से वही छोटा हरा साँप बाहर निकला।
इस बार उसकी आँखों में घबराहट थी।
"तुम आ ही गए..."
सर्पराज ने पूछा—
"तुम मेरा इंतज़ार कर रहे थे?"
साँप ने सिर हिलाया।
"मैं तुम्हारा नहीं..."
"...तुम्हारे निर्णय का इंतज़ार कर रहा था।"
"तुम हो कौन?"
सर्पराज ने फिर वही प्रश्न पूछा।
इस बार साँप कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—
"मेरा नाम हरित है।"
"मैं एक स्मृति-सर्प हूँ।"
"स्मृति-सर्प?"
"हम लड़ते नहीं..."
"हम याद रखते हैं।"
"जो इतिहास सब भूल जाते हैं..."
"...उसे हम सँभालते हैं।"
सर्पराज कुछ और पूछ पाता...
उससे पहले हरित ने अचानक अपना फन उठा लिया।
"कोई आ रहा है..."
दोनों तुरंत एक विशाल वृक्ष की जड़ों के पीछे छिप गए।
कुछ ही क्षण बाद...
तीन काले वस्त्र पहने अजनबी जंगल के रास्ते से गुज़रे।
उनके चेहरों पर धातु के मुखौटे थे।
उनके हाथों में कोई हथियार नहीं था।
लेकिन उनके चारों ओर धुएँ जैसी काली ऊर्जा घूम रही थी।
पहला व्यक्ति बोला—
"वह लड़का अभी तक गाँव से बाहर नहीं निकला?"
दूसरे ने उत्तर दिया—
"स्वामी ने कहा है...
वह स्वयं आएगा।"
तीसरा धीमे से हँसा।
"उत्तराधिकारी हमेशा जिज्ञासा से हारता है।"
तीनों आगे बढ़ गए।
सर्पराज की साँस तेज़ हो गई।
"ये लोग..."
"मुझे ढूँढ़ रहे हैं?"
हरित ने गंभीर स्वर में कहा—
"नहीं..."
"...वे तुम्हें मारना नहीं चाहते।"
"तो?"
"वे चाहते हैं कि..."
"...तुम स्वयं उनके लिए द्वार खोलो।"
उसी समय...
शेषवन।
आर्यकेतु सर्पराज के कक्ष में पहुँचे।
दरवाज़ा खुला था।
कमरा खाली।
बिस्तर अछूता।
खिड़की खुली हुई।
फ़र्श पर मिट्टी का एक छोटा-सा निशान।
आर्यकेतु ने उसे देखा...
और उनकी आँखें फैल गईं।
"निषिद्ध वन..."
उन्होंने तुरंत बाहर खड़े रक्षक से कहा—
"आपात संकेत बजाओ!"
पूरा गाँव गूँज उठा।
ढाऽऽऽम!
ढाऽऽऽम!
यह युद्ध का संकेत नहीं था।
यह था—
"उत्तराधिकारी लापता है।"
उधर...
नागलोक।
महाऋषि वासुकिर ध्यान में बैठे थे।
अचानक उनके सामने ऊर्जा का एक वृत्त बना।
उसमें शेषवन की छवि दिखाई दी।
फिर...
सर्पराज का धुँधला चेहरा।
वासुकिर ने आँखें खोल दीं।
"उसने सीमा पार कर दी..."
उनके सामने खड़े दूत ने पूछा—
"क्या हम हस्तक्षेप करें?"
वासुकिर ने कुछ पल विचार किया।
फिर बोले—
"नहीं।"
"कुछ रास्ते केवल चलकर ही समझे जा सकते हैं।"
जंगल के भीतर...
सर्पराज और हरित आगे बढ़ रहे थे।
अचानक...
हरित रुक गया।
"यहीं से सावधान रहना।"
सामने ज़मीन पर एक विशाल गोलाकार क्षेत्र था।
उसके भीतर एक भी पेड़ नहीं था।
बीच में...
काले पत्थरों का बना एक टूटा हुआ द्वार खड़ा था।
और द्वार के ऊपर...
वही चिन्ह।
जो लटकन पर था।
सर्पराज की धड़कन तेज़ हो गई।
"क्या यही..."
हरित ने सिर झुका लिया।
"हाँ..."
"यही है विस्मृत द्वार।"
उसी क्षण...
सर्पराज के हाथ का लटकन हवा में स्वयं उठ गया।
उससे निकलती हरी रोशनी सीधे उस प्राचीन द्वार से जा टकराई।
धरती काँपने लगी।
और बहुत दूर...
पहाड़ी की चोटी पर खड़ी वह रहस्यमयी काली आकृति मुस्कुरा उठी।
"अंततः...""उत्तराधिकारी पहुँच गया।"
धरती काँप रही थी।
प्राचीन पत्थरों से बना विस्मृत द्वार धीरे-धीरे हरी रोशनी से भरने लगा।
द्वार पर उकेरे गए प्रतीक एक-एक करके चमक उठे।
सर्पराज अनायास एक कदम आगे बढ़ा।
उसी क्षण...
हरित बिजली की गति से उसके सामने आ गया।
"रुको!"
सर्पराज ठिठक गया।
"क्यों?"
हरित की आवाज़ पहले से कहीं अधिक गंभीर थी।
"यह द्वार रास्ता नहीं..."
"परीक्षा है।"
"किसकी परीक्षा?"
हरित ने सीधे उत्तर नहीं दिया।
उसने केवल द्वार की ओर देखा।
"जो लोग शक्ति चाहते हैं..."
"...वे इस द्वार के भीतर मर जाते हैं।"
"और..."
"...जो सत्य चाहते हैं..."
"...वे पहले स्वयं को खो देते हैं।"
सर्पराज कुछ समझ नहीं पाया।
लेकिन तभी...
द्वार के बीचोंबीच एक गोलाकार प्रकाश उभर आया।
उस प्रकाश में धीरे-धीरे एक चेहरा बनने लगा।
चेहरा...
जिसे देखकर सर्पराज की साँस थम गई।
वह...
आर्यकेतु थे।
वे मुस्कुरा रहे थे।
"सर्पराज..."
"आओ..."
"मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ।"
सर्पराज एक कदम आगे बढ़ा।
"गुरुजी!"
हरित ज़ोर से चिल्लाया—
"नहीं!"
"वह आर्यकेतु नहीं हैं!"
सर्पराज रुक गया।
द्वार के भीतर खड़े आर्यकेतु का चेहरा अचानक विकृत होने लगा।
कुछ ही क्षणों में...
वह एक अजीब काली आकृति में बदल गया।
फिर सब गायब हो गया।
सर्पराज के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
"यह..."
"क्या था?"
हरित ने गहरी साँस ली।
"द्वार तुम्हें वही दिखाता है..."
"...जिस पर तुम्हें सबसे अधिक विश्वास हो।"
सर्पराज ने पहली बार महसूस किया...
यह केवल कोई प्राचीन अवशेष नहीं था।
यह...
जीवित था।
उसी समय...
शेषवन।
आर्यकेतु बीस रक्षकों के साथ निषिद्ध वन में प्रवेश कर चुके थे।
एक रक्षक घुटनों के बल बैठा।
उसने मिट्टी को छुआ।
"प्रधान रक्षक..."
"यह देखिए।"
मिट्टी पर सर्पराज के पैरों के निशान थे।
लेकिन...
उनके ऊपर एक और पदचिह्न था।
बहुत बड़ा।
मानव जैसा...
लेकिन पंजों के साथ।
आर्यकेतु का चेहरा कठोर हो गया।
उन्होंने तलवार निकाल ली।
"हम अकेले नहीं हैं।"
उधर...
पहाड़ी की चोटी पर खड़ी काली आकृति सब कुछ देख रही थी।
उसने अपनी हथेली आगे बढ़ाई।
उसकी उँगलियों के बीच काली ऊर्जा घूमने लगी।
फिर...
उसने हवा में एक छोटा-सा चिन्ह बनाया।
जंगल में अचानक...
सैकड़ों काले कौए प्रकट हो गए।
उन्होंने एक साथ उड़ान भरी।
उनकी काँव-काँव से पूरा वन गूँज उठा।
हरित अचानक काँप उठा।
"वे आ गए..."
सर्पराज ने पूछा—
"कौन?"
हरित ने पहली बार भयभीत होकर कहा—
"छाया-शिकारी।"
दूर...
पेड़ों के बीच...
काले मुखौटे पहने वही तीन लोग दिखाई दिए।
लेकिन अब वे अकेले नहीं थे।
उनके पीछे...
दर्जनों काली आकृतियाँ चल रही थीं।
वे इंसान जैसी दिखती थीं...
लेकिन उनकी आँखों में कोई जीवन नहीं था।
सर्पराज ने धीमे से पूछा—
"ये कौन हैं?"
हरित की आवाज़ धीमी हो गई।
"जो लोग..."
"...पहले इस द्वार को खोलने आए थे।"
"और..."
"...कभी लौटकर नहीं गए।"
सर्पराज के हाथ का लटकन अचानक तेज़ी से चमकने लगा।
द्वार के बीच एक नई रेखा उभरी।
धीरे-धीरे...
पत्थर पर प्राचीन अक्षर उभरने लगे।
सर्पराज उन्हें पढ़ नहीं सकता था।
लेकिन...
उसे उनका अर्थ समझ में आ रहा था।
मानो कोई सीधे उसके मन में बोल रहा हो।
"उत्तराधिकारी..."
"प्रवेश की अनुमति तभी मिलेगी..."
"जब तुम अपना पहला सत्य स्वीकार करोगे।"
सर्पराज की भौंहें सिकुड़ गईं।
"पहला सत्य?"
उसी क्षण...
उसके सामने फिर वही स्त्री दिखाई दी...
जिसे उसने लटकन छूते समय देखा था।
इस बार उसका चेहरा स्पष्ट था।
उसकी आँखों में आँसू थे।
वह कुछ कहना चाहती थी...
लेकिन उसके होंठों से आवाज़ नहीं निकली।
उसने केवल अपनी उँगली उठाकर...
सर्पराज के सीने की ओर इशारा किया।
और फिर...
अपने हृदय पर हाथ रख दिया।
दृश्य समाप्त हो गया।
हरित ने धीरे से कहा—
"द्वार तुम्हें संकेत दे रहा है।"
"लेकिन उत्तर..."
"...तुम्हें स्वयं खोजना होगा।"
उसी समय...
दूर से तलवारों की टकराने की आवाज़ आई।
खनन्!
धड़ाम!
आर्यकेतु और उनके रक्षक...
छाया-शिकारियों से भिड़ चुके थे।
सर्पराज ने चौंककर उस दिशा में देखा।
"गुरुजी!"
वह दौड़ने ही वाला था...
कि विस्मृत द्वार से अचानक हरी ऊर्जा की एक लहर निकली...
और उसके तथा युद्धभूमि के बीच एक चमकती हुई दीवार खड़ी हो गई।
वह चाहे जितनी कोशिश करता...
उस दीवार को पार नहीं कर पा रहा था।
उधर...
आर्यकेतु पहली बार उस रहस्यमयी काली आकृति के सामने खड़े थे।
दोनों की नज़रें मिलीं।
काली आकृति मुस्कुराई।
और बोली—
"हज़ार वर्ष पहले भी तुम हार गए थे..."
"क्या इस बार भी वही इतिहास दोहराओगे... आर्यकेतु?"
आर्यकेतु का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
उन्होंने धीमे से कहा—
"...तुम?"
हरी ऊर्जा की दीवार...
सर्पराज पूरी ताकत से उस पर प्रहार कर रहा था।
धड़ाम!
धड़ाम!
लेकिन हर बार उसका हाथ उसी ऊर्जा से टकराकर पीछे धकेल दिया जाता।
"मुझे जाने दो!"
उसकी आवाज़ पूरे जंगल में गूँज उठी।
दूसरी ओर...
आर्यकेतु अकेले खड़े थे।
उनके पीछे घायल रक्षक संघर्ष कर रहे थे।
और उनके सामने...
वह रहस्यमयी काली आकृति।
कुछ क्षण दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर काली आकृति हँसी।
वह हँसी किसी मनुष्य की नहीं थी।
मानो सूखी चट्टानों के टूटने की आवाज़ हो।
"समय ने तुम्हें बूढ़ा कर दिया, आर्यकेतु..."
"लेकिन तुम्हारी आँखों में वही डर आज भी ज़िंदा है।"
आर्यकेतु ने तलवार और मज़बूती से पकड़ ली।
"तुम्हें फिर कभी लौटना नहीं चाहिए था..."
काली आकृति ने सिर थोड़ा झुकाया।
"मैं लौटा नहीं..."
"मुझे वापस बुलाया गया है।"
यह सुनकर आर्यकेतु की आँखों में एक पल के लिए उलझन उभरी।
"झूठ!"
"पहली मुहर तुमने तोड़ी!"
काली आकृति की मुस्कान गायब हो गई।
उसने शांत स्वर में कहा—
"अगर पहली मुहर मैं तोड़ सकता..."
"...तो हज़ार साल कैद क्यों रहता?"
आर्यकेतु कुछ क्षण मौन रह गए।
पहली बार...
उनके मन में संदेह पैदा हुआ।
उधर...
ऊर्जा की दीवार के पीछे खड़ा सर्पराज यह सब सुन रहा था।
उसने हरित की ओर देखा।
"क्या..."
"यह सच कह रहा है?"
हरित ने तुरंत उत्तर नहीं दिया।
उसने गहरी साँस ली।
"इतिहास..."
"...हमेशा पूरा नहीं बताया जाता।"
सर्पराज ने उसकी ओर घूरकर देखा।
"तुम्हें सब पता है?"
हरित ने धीरे से कहा—
"मैं स्मृति-सर्प हूँ।"
"मुझे इतिहास याद है।"
"लेकिन..."
"...मुझे उसे बदलने की अनुमति नहीं।"
"किसने रोका है तुम्हें?"
हरित ने पहली बार ऊपर आकाश की ओर देखा।
उसकी आँखों में भय था।
"जिन्होंने..."
"...स्मृतियों को जीवित रखा है।"
उसी समय...
काली आकृति ने अपनी हथेली आगे बढ़ाई।
उसके हाथ के ऊपर काली ऊर्जा घूमने लगी।
लेकिन उसने हमला नहीं किया।
उसने केवल एक प्रश्न पूछा।
"आर्यकेतु..."
"क्या तुमने उसे सच बता दिया?"
आर्यकेतु मौन रहे।
"नहीं..."
काली आकृति ने स्वयं ही उत्तर दे दिया।
"तुमने फिर वही गलती की।"
"चुप रहो!"
आर्यकेतु दहाड़े।
वे बिजली की गति से आगे बढ़े।
उनकी तलवार सीधी काली आकृति की गर्दन की ओर गई।
लेकिन...
तलवार उसके शरीर को छूते ही...
धुएँ के बीच से निकल गई।
मानो वहाँ कोई ठोस शरीर था ही नहीं।
अगले ही क्षण...
काली आकृति आर्यकेतु के पीछे खड़ी थी।
उसने कोई हथियार नहीं उठाया।
केवल फुसफुसाई—
"मैं तुम्हारा शत्रु नहीं हूँ..."
"तुम्हारा शत्रु..."
"...तुम्हारी चुप्पी है।"
उसी पल...
ऊर्जा की दीवार अचानक काँप उठी।
विस्मृत द्वार से फिर वही आवाज़ आई—
"सत्य छिपाया गया है..."
"उत्तराधिकारी को अधूरा इतिहास दिया गया है..."
सर्पराज का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
"अधूरा इतिहास...?"
तभी...
द्वार के सामने हवा में प्रकाश का एक विशाल वृत्त उभरा।
उस वृत्त के भीतर...
एक युद्ध दिखाई देने लगा।
लेकिन...
यह युद्ध वर्तमान का नहीं था।
यह बहुत पुराना था।
हज़ारों योद्धा।
सात विशाल स्तंभ।
आकाश से गिरती हरी अग्नि।
और...
दो सेनाएँ।
एक के ध्वज पर चमकता हुआ सर्प।
दूसरी के ध्वज पर वही रहस्यमय चिन्ह...
जो लटकन पर बना था।
सर्पराज ने विस्मय से देखा।
उस युद्ध में...
आर्यकेतु भी थे।
लेकिन...
वे बूढ़े नहीं।
युवा थे।
उनके साथ...
महाऋषि वासुकिर भी युद्ध कर रहे थे।
"यह..."
सर्पराज की आवाज़ काँप गई।
"यह कैसे संभव है?"
हरित ने आँखें बंद कर लीं।
"क्योंकि..."
"तुम्हें जो बताया गया कि यह युद्ध हज़ार वर्ष पहले हुआ था..."
"वह पूरी सच्चाई नहीं है।"
उसी क्षण...
दृश्य में एक और चेहरा दिखाई दिया।
काली आकृति...
लेकिन इस बार वह वैसी नहीं थी जैसी आज है।
उसके चेहरे पर अंधकार नहीं था।
वह एक साधारण योद्धा की तरह दिख रहा था।
और...
वह नागलोक की सेना के साथ लड़ रहा था।
सर्पराज की आँखें फैल गईं।
"यह..."
"यह तो..."
दृश्य अचानक टूट गया।
ऊर्जा का वृत्त गायब हो गया।
पूरा जंगल फिर शांत हो गया।
काली आकृति ने धीरे से मुस्कुराकर कहा—
"देखा..."
"इतिहास..."
"...विजेता लिखते हैं।"
आर्यकेतु का चेहरा कठोर था।
लेकिन उनकी आँखों में दर्द साफ़ दिखाई दे रहा था।
उन्होंने पहली बार सर्पराज की ओर देखा।
और बहुत धीमे स्वर में कहा—
"मैंने तुमसे झूठ बोला..."
"...लेकिन कारण था।"
सर्पराज कुछ बोल पाता...
उससे पहले...
जंगल के भीतर से एक भयानक गर्जना गूँजी।
धरती फिर काँपी।
विस्मृत द्वार के पीछे कहीं...
कुछ विशाल जाग चुका था।
हरी ऊर्जा की दीवार अचानक टूटकर बिखर गई।
और द्वार के ऊपर एक नई दरार उभर आई।
हरित की आँखों में भय उतर आया।
उसने काँपती आवाज़ में कहा—
"नहीं..."
"दूसरी मुहर समय से पहले टूट रही है..."
पूरा निषिद्ध वन काँप रहा था।
विस्मृत द्वार पर पड़ी दरार हर पल गहरी होती जा रही थी।
हरी और नीली ऊर्जा आपस में टकराकर आकाश तक उठ रही थी।
सर्पराज, आर्यकेतु, शेषकेतु, हरित और वह रहस्यमयी काली आकृति...
सभी की नज़रें एक ही स्थान पर थीं।
द्वार के सामने खड़ा था—
वह सफेद बालों वाला रहस्यमयी बालक।
उसने मुस्कुराकर फिर कहा—
"तुम बहुत देर से आए... भाई।"
"मैं... तुम्हारा भाई नहीं हूँ।"
सर्पराज ने दृढ़ आवाज़ में कहा।
बालक हल्का-सा हँसा।
"तुम्हें यही बताया गया है।"
इतना कहकर उसने अपनी हथेली आगे बढ़ाई।
उसकी हथेली पर वही नाग-चिह्न चमक रहा था...
जो सर्पराज के गले में पड़े काले लटकन पर बना था।
सर्पराज एक पल के लिए चौंका, लेकिन तुरंत संभल गया।
उसी समय...
धरती फिर हिली।
धम्म्म!!
विस्मृत द्वार के दोनों ओर बने विशाल पत्थर के स्तंभ टूटने लगे।
हरित घबराकर चिल्लाया—
"सब लोग पीछे हटो!"
"द्वार अपनी रक्षा शुरू कर चुका है!"
अचानक...
टूटे हुए पत्थरों के बीच से दर्जनों पत्थर के सैनिक बाहर निकल आए।
आठ-आठ फुट लंबे।
पत्थर के बने शरीर।
नीली चमकती आँखें।
हाथों में विशाल तलवारें।
एक साथ उनकी गर्दन सर्पराज की ओर घूमी।
शेषकेतु ने बिना एक पल गंवाए अपना स्वर्ण भाला घुमा दिया।
ठाऽऽङ्ग!
पहला पत्थर सैनिक दो टुकड़ों में बँट गया।
लेकिन...
जहाँ उसका शरीर गिरा...
वहीं से दो नए सैनिक खड़े हो गए।
"ये खत्म क्यों नहीं हो रहे?"
एक रक्षक चिल्लाया।
हरित ने उत्तर दिया—
"ये जीव नहीं हैं!"
"ये द्वार के प्रहरी हैं!"
"रक्षकों!"
आर्यकेतु गरजे।
"सर्पराज तक कोई नहीं पहुँचना चाहिए!"
दसों रक्षक तुरंत एक घेरा बनाकर खड़े हो गए।
तलवारें चमक उठीं।
अगले ही पल...
पूरा जंगल युद्धभूमि बन चुका था।
ठनाक!
खड़ाऽऽक!
धड़ाम!
तलवारें टकरा रही थीं।
पत्थर उड़ रहे थे।
रक्षक एक-एक कर प्रहरियों को रोक रहे थे।
लेकिन हर टूटे प्रहरी की जगह...
दो नए प्रहरी खड़े हो जाते।
सर्पराज ने गिरे हुए एक रक्षक की तलवार उठाई।
यह उसके जीवन का पहला वास्तविक युद्ध था।
एक पत्थर प्रहरी सीधे उसकी ओर दौड़ा।
सर्पराज ने पूरी ताकत से वार किया।
ठाऽऽक!
उसकी तलवार प्रहरी की बाँह पर लगी।
बाँह टूटकर गिर गई।
लेकिन उसी क्षण...
नई बाँह फिर बन गई।
"कमज़ोर जगह ढूँढो!"
शेषकेतु गरजे।
वे हवा में उछले।
उन्होंने एक प्रहरी के सिर पर भाला मारा।
सिर टूट गया...
लेकिन कुछ नहीं हुआ।
प्रहरी फिर खड़ा हो गया।
तभी...
सफेद बालों वाला बालक शांत स्वर में बोला—
"सिर नहीं..."
"हृदय।"
शेषकेतु ने उसकी ओर देखा।
"क्या?"
बालक ने एक प्रहरी की छाती की ओर इशारा किया।
वहाँ एक छोटी-सी नीली रोशनी धड़क रही थी।
"वहीं वार करो!"
शेषकेतु ने बिना देर किए भाला उसी रोशनी पर दे मारा।
धाऽऽम!
इस बार प्रहरी पूरी तरह धूल में बदल गया।
और...
वापस नहीं उठा।
"सब लोग!"
आर्यकेतु गरजे।
"छाती का नीला केंद्र!"
पूरा युद्ध बदल गया।
अब हर रक्षक सीधे उसी लक्ष्य पर हमला कर रहा था।
एक-एक करके पत्थर प्रहरी गिरने लगे।
लेकिन...
युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ था।
विस्मृत द्वार के भीतर से एक गहरी गर्जना सुनाई दी।
इस बार...
इतनी शक्तिशाली कि सभी योद्धा कुछ क्षण के लिए अपने कान पकड़कर घुटनों पर बैठ गए।
सिर्फ़ दो लोग खड़े रहे—
सर्पराज...
और वह रहस्यमयी बालक।
दोनों की आँखें एक साथ द्वार पर टिक गईं।
बालक की मुस्कान पहली बार गायब हुई।
उसने धीमे स्वर में कहा—
"वह जाग गया..."
सर्पराज ने पूछा—
"कौन?"
बालक ने उत्तर दिया—
"दूसरी मुहर का प्रहरी..."
"...और उसे रोकना अब सिर्फ़ तुम्हारे हाथ में है।"
उसी क्षण...
विस्मृत द्वार के भीतर से एक विशाल काला पंजा बाहर निकला...
और एक ही वार में पत्थर के दोनों स्तंभ चकनाचूर हो गए।
धड़ाऽऽऽम!!
विस्मृत द्वार का आधा हिस्सा विस्फोट के साथ टूट गया।
पत्थरों का तूफ़ान चारों ओर फैल गया।
सैकड़ों चट्टानें बिजली की गति से जंगल की ओर उड़ने लगीं।
"सब नीचे झुको!"
आर्यकेतु गरजे।
रक्षक तुरंत फैल गए।
शेषकेतु ने अपना स्वर्ण भाला दोनों हाथों से घुमाया।
भाले से निकली स्वर्णिम ऊर्जा ने हवा में ही दर्जनों चट्टानों को चूर-चूर कर दिया।
लेकिन...
कुछ विशाल पत्थर सीधे सर्पराज की ओर आ रहे थे।
सफेद बालों वाला रहस्यमयी बालक आगे बढ़ा।
उसने अपनी हथेली उठाई।
पत्थर उसके सामने पहुँचते ही हवा में रुक गए।
एक पल...
दो पल...
फिर वे धीरे-धीरे धूल बनकर ज़मीन पर बिखर गए।
"तुम आखिर हो कौन?"
सर्पराज ने पूछा।
बालक ने उसकी ओर देखा।
"अगर अभी मेरा नाम जान गए..."
"...तो बहुत लोग मर जाएँगे।"
इतना कहकर वह फिर द्वार की ओर मुड़ गया।
अचानक...
धरती दो हिस्सों में फट गई।
फटी हुई ज़मीन से एक विशाल आकृति बाहर निकलने लगी।
पहले उसके सींग दिखाई दिए।
फिर पत्थर जैसी काली खोपड़ी।
उसके बाद बीस फीट ऊँचा पूरा शरीर।
उसके कंधों पर लोहे जैसी मोटी जंजीरें लिपटी थीं।
हर जंजीर पर प्राचीन मंत्र चमक रहे थे।
दोनों आँखें जलते हुए नीले सूर्य जैसी थीं।
उसने पहला कदम रखा।
भूऊऊम!!
आस-पास के पेड़ जड़ों समेत उखड़ गए।
दूसरा कदम...
पूरी घाटी काँप उठी।
हरित की आवाज़ काँप रही थी।
"यही है..."
"दूसरी मुहर का प्रहरी।"
प्रहरी ने किसी पर हमला नहीं किया।
उसने सीधे सर्पराज को देखा।
फिर भारी आवाज़ में कहा—
"उत्तराधिकारी..."
"मुड़ जाओ।"
आर्यकेतु ने मौका देखकर हमला कर दिया।
उनकी तलवार बिजली की तरह चमकी।
ठाऽऽक!!
तलवार प्रहरी की टाँग से टकराई।
चिंगारियाँ निकलीं।
लेकिन कोई असर नहीं।
प्रहरी ने केवल अपना हाथ घुमाया।
हवा का इतना शक्तिशाली झोंका उठा कि आर्यकेतु दस कदम पीछे जा गिरे।
"सब एक साथ!"
शेषकेतु गरजे।
दसों रक्षक, शेषकेतु और आर्यकेतु...
सभी एक साथ टूट पड़े।
तलवारें।
भाले।
तीर।
ऊर्जा।
पूरा युद्धक्षेत्र चमक उठा।
लेकिन...
प्रहरी अपनी जगह से मुश्किल से हिला।
उसने केवल अपनी जंजीरों को झटका।
छन्न्न्न!!
लोहे की वे विशाल जंजीरें जीवित नागों की तरह हवा में लहराईं।
एक ही वार में तीन रक्षक दूर जा गिरे।
दूसरी जंजीर ने शेषकेतु का भाला लपेट लिया।
जोरदार झटका।
भाला उनके हाथ से छूट गया।
"नहीं!"
सर्पराज दौड़ पड़ा।
उसने ज़मीन से एक टूटी हुई तलवार उठाई।
पूरी ताकत से छलाँग लगाई।
और...
सीधे प्रहरी की जंजीर पर वार किया।
ठाऽऽङ्ग!!
चिंगारियाँ उड़ीं।
जंजीर पर एक छोटी-सी दरार पड़ गई।
प्रहरी पहली बार रुका।
उसने सर्पराज की ओर देखा।
उसकी आँखों में क्रोध नहीं था।
बल्कि...
आश्चर्य था।
"तुम..."
"...जंजीर को छू सकते हो?"
हरित की आँखें फैल गईं।
"असंभव..."
उसी क्षण...
काली आकृति पहाड़ी से नीचे कूद पड़ी।
वह बिजली की गति से युद्धभूमि में पहुँची।
इस बार उसने किसी पर हमला नहीं किया।
उसने सीधे सर्पराज से कहा—
"उसकी जंजीरें मत तोड़ो!"
"अगर एक भी जंजीर टूटी..."
"...तो दूसरी मुहर पूरी तरह खुल जाएगी!"
"तो फिर इसे हराएँ कैसे?"
सर्पराज ने दहाड़कर पूछा।
काली आकृति ने उत्तर दिया—
"उसे हराना नहीं है..."
"उसे याद दिलाना है कि वह कौन है।"
इतना कहते ही...
प्रहरी के माथे पर बना एक प्राचीन चिन्ह चमकने लगा।
और उसके चारों ओर हवा में...
एक योद्धा की धुँधली छवि उभर आई।
सर्पराज ने ध्यान से देखा।
वह कोई राक्षस नहीं था।
वह कभी...
एक नाग योद्धा था।
प्रहरी दर्द से दहाड़ उठा।
उसने दोनों हाथ सिर पर रख लिए।
मानो उसके भीतर दो अलग-अलग शक्तियाँ संघर्ष कर रही हों।
उसी क्षण...
विस्मृत द्वार के अंदर से एक और गर्जना सुनाई दी।
पहले से भी ज़्यादा भयानक।
हरित भय से पीछे हट गया।
उसकी आवाज़ काँप रही थी—
"नहीं..."
"दूसरी मुहर के पीछे..."
"कुछ और भी कैद है।"
और उसी पल...
द्वार के भीतर दो विशाल लाल आँखें खुल गईं।
पूरे निषिद्ध वन में सन्नाटा छा गया।
विस्मृत द्वार के भीतर चमकती वे दो विशाल लाल आँखें...
एकटक सबको देख रही थीं।
उनकी दृष्टि में ऐसा दबाव था कि अनुभवी योद्धाओं के भी घुटने काँप उठे।
लेकिन...
उसने कोई हमला नहीं किया।
अचानक...
गर्जना!!
दूसरी मुहर का प्रहरी दर्द से चीख उठा।
उसके शरीर पर लिपटी जंजीरें आग की तरह चमकने लगीं।
वह दोनों हाथों से अपना सिर पकड़कर ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गया।
"अभी!"
काली आकृति चिल्लाई।
"यही मौका है!"
आर्यकेतु ने तलवार उठाई।
"सभी रक्षक! इसे बाँध लो!"
शेषकेतु ने अपना स्वर्ण भाला फिर से हाथ में लिया।
उन्होंने भाला आकाश की ओर उछाला।
भाला सात स्वर्णिम किरणों में बँट गया।
सातों किरणें बिजली की गति से नीचे आईं...
और प्रहरी के चारों ओर एक ऊर्जा-वृत्त बन गया।
लेकिन...
वृत्त केवल तीन साँसों तक ही टिक पाया।
धाऽऽम!!
प्रहरी ने दहाड़ते हुए दोनों हाथ फैलाए।
स्वर्णिम ऊर्जा चकनाचूर हो गई।
शेषकेतु कई कदम पीछे फिसल गए।
उनके होंठों से पहली बार रक्त निकला।
"इतनी शक्ति..."
आर्यकेतु बुदबुदाए।
इसी बीच...
सर्पराज की नज़र प्रहरी के माथे पर पड़ी।
वहाँ वही प्राचीन चिन्ह चमक रहा था।
लेकिन हर बार लाल आँखें चमकतीं...
वह चिन्ह काला पड़ जाता।
"हरित!"
सर्पराज ने पुकारा।
"उसके माथे पर बना चिन्ह क्या है?"
हरित ने तुरंत उत्तर दिया।
"वह स्मृति-मुद्रा है!"
"जब तक वह सुरक्षित है..."
"...प्रहरी अपनी पहचान नहीं भूलेगा।"
सर्पराज ने तुरंत निर्णय लिया।
"तो हमें उसकी रक्षा करनी होगी!"
काली आकृति ने उसकी बात सुन ली।
उसने पहली बार संतोष से सिर हिलाया।
"अब तुम सही सोच रहे हो।"
लेकिन उसी क्षण...
विस्मृत द्वार के भीतर की लाल आँखें और चमक उठीं।
द्वार के भीतर से एक लंबी, काली ऊर्जा-लता बाहर निकली।
वह सीधी प्रहरी के माथे की ओर बढ़ी।
"रोक दो उसे!"
आर्यकेतु गरजे।
तीरों की बौछार हुई।
भाले फेंके गए।
तलवारें चलीं।
लेकिन...
काली ऊर्जा किसी धुएँ की तरह सबके आर-पार निकल गई।
सर्पराज दौड़ पड़ा।
उसके और प्रहरी के बीच मुश्किल से बीस कदम का फ़ासला था।
दस...
आठ...
पाँच...
तभी...
ज़मीन फट गई।
एक विशाल दरार उसके सामने खुल गई।
सर्पराज बिना रुके छलाँग लगा गया।
वह दरार पार कर गया...
लेकिन उतरते ही तीन पत्थर-प्रहरी उसके सामने आ खड़े हुए।
पहले प्रहरी ने तलवार चलाई।
सर्पराज झुक गया।
दूसरे का वार आया।
उसने गिरी हुई ढाल उठाकर रोका।
तीसरा पीछे से हमला करने आया।
सर्पराज घूमकर उसकी छाती के नीले केंद्र पर वार कर चुका था।
धड़ाम!
प्रहरी धूल बनकर बिखर गया।
"अच्छा!"
शेषकेतु चिल्लाए।
"यही गति बनाए रखो!"
सर्पराज बिना रुके आगे बढ़ता रहा।
दूसरा प्रहरी...
तीसरा...
चौथा...
हर वार अब पहले से अधिक सटीक था।
वह पहली बार युद्ध में अपने शरीर की लय महसूस कर रहा था।
उधर...
काली ऊर्जा-लता अब प्रहरी के माथे से केवल एक हाथ दूर थी।
प्रहरी दर्द से चिल्ला रहा था।
"नहीं!"
सर्पराज ने पूरी ताकत से छलाँग लगाई।
हवा में घूमते हुए उसने अपनी तलवार दोनों हाथों से पकड़ ली।
और...
सीधा उस काली ऊर्जा-लता पर वार किया।
छ्श्श्श्श!!
तलवार टकराते ही चिंगारियाँ नहीं...
हरी अग्नि निकली।
काली ऊर्जा दो टुकड़ों में कट गई।
पूरा जंगल एक पल के लिए शांत हो गया।
प्रहरी की आँखों का नीला प्रकाश स्थिर हो गया।
उसने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।
पहली बार...
उसकी आवाज़ में पीड़ा नहीं थी।
उसने सर्पराज की ओर देखा।
और कहा—
"धन्यवाद..."
लेकिन राहत केवल एक पल की थी।
विस्मृत द्वार के भीतर की लाल आँखें अचानक बंद हो गईं।
फिर...
पूरे द्वार पर अनगिनत दरारें फैल गईं।
ट्र्र्र्र्राक!!
एक विशाल पत्थर का हिस्सा टूटकर गिरा।
उस टूटे हुए अंधकार के भीतर से...
एक विशाल काला हाथ धीरे-धीरे बाहर आने लगा।
उसके नाखून तलवारों जितने लंबे थे।
और उसकी एक उँगली ही...
दूसरी मुहर के प्रहरी से भी बड़ी थी।
हरित भय से काँप उठा।
उसके मुँह से मुश्किल से शब्द निकले—
"वह... प्रहरी नहीं था..."
"वह तो केवल... ताला था।"

"असली कैदी... अब बाहर आ रहा है।" 

धरती काँप रही थी.
विस्मृत द्वार के भीतर से निकलता वह विशाल काला हाथ धीरे- धीरे बाहर आ रहा था.
उसकी एक उँगली ही.
दूसरी मुहर के प्रहरी से भी बडी थी.
हरित भय से काँप उठा.
उसके मुँह से मुश्किल से शब्द निकले—
वह. प्रहरी नहीं था.
वह तो केवल. ताला था.
असली कैदी. अब बाहर आ रहा है।
धडाऽऽऽम!
विशाल हाथ ने पहली बार जमीन को छुआ.
पूरा निषिद्ध वन भूकंप की तरह हिल उठा.
सैकडों पेड जडों समेत उखड गए.
चट्टानें टूटकर घाटी में गिरने लगीं.
सभी रक्षक!
आर्यकेतु गरजे.
युद्ध- व्यूह बनाओ!
दसों रक्षक पलभर में फैल गए.
चार आगे.
चार दोनों किनारों पर.
दो पीछे.
शेषकेतु सबसे आगे खडे थे.
स्वर्ण भाला चमक उठा.
लेकिन.
इस बार काला हाथ किसी पर हमला नहीं कर रहा था.
वह.
कुछ खोज रहा था.
धीरे- धीरे उसकी विशाल उँगलियाँ हवा में घूमीं.
फिर.
सीधे सर्पराज की दिशा में रुक गईं.
हरित चीख पडा—
यह तुम्हें महसूस कर चुका है!
अगले ही पल.
काला हाथ बिजली की गति से सर्पराज की ओर बढा.
सर्पराज!
आर्यकेतु ने पूरी ताकत से छलाँग लगाई.
उन्होंने सर्पराज को धक्का देकर दूर गिरा दिया.
लेकिन.
वे स्वयं उस हाथ की चपेट में आ गए.
धाऽऽऽम!
आर्यकेतु एक चट्टान से टकराए.
उनकी तलवार दूर जा गिरी.
कंधे से रक्त बहने लगा.
प्रधान रक्षक!
सैनिक उनकी ओर दौडे.
लेकिन काला हाथ फिर आगे बढ चुका था.
अब मेरी बारी!
शेषकेतु गरजे.
उन्होंने अपना स्वर्ण भाला आकाश की ओर उठाया.
भाले से सात स्वर्णिम प्रकाश- रेखाएँ निकलीं.
वे सीधी उस कलाई पर जाकर टकराईं.
ठाऽऽऽड्ग!
इस बार.
पहली बार.
काले हाथ की त्वचा पर एक गहरी दरार पडी.
पूरा जंगल गूँज उठा.
विशाल गर्जना हुई.
काला हाथ पीछे हट गया.
घायल हुआ है!
एक रक्षक खुशी से चिल्लाया.
नहीं!
हरित ने तुरंत रोक दिया.
यह घायल नहीं.
क्रोधित हुआ है!
उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि.
काले हाथ की दरार से काला धुआँ निकलने लगा.
धुआँ हवा में फैलते ही.
दर्जनों आकृतियों में बदल गया.
वे लगभग मनुष्य जैसे थे.
लेकिन.
उनके शरीर पूरी तरह धुएँ से बने थे.
हाथों में काली तलवारें.
आँखें लाल.
एक साथ.
वे सभी रक्षकों पर टूट पडे.
युद्ध!
आर्यकेतु दहाडे.
पूरा निषिद्ध वन रणभूमि बन गया.
तलवारें टकराईं.
भाले चले.
तीरों की वर्षा होने लगी.
धुएँ की आकृतियाँ कटतीं.
और फिर दोबारा बन जातीं.
सर्पराज भी युद्ध में कूद पडा.
उसने एक धुएँ की आकृति पर वार किया.
तलवार उसके आर- पार निकल गई.
कोई असर नहीं.
दूसरा वार.
तीसरा.
कुछ नहीं.
हथियार काम नहीं कर रहे!
हरित दौडकर उसके पास आया.
उनके शरीर पर नहीं!
उनकी छाया पर वार करो!
क्या?
देखो!
हरित ने एक धुएँ की आकृति के पैरों के नीचे इशारा किया.
जमीन पर उसकी छाया.
बाकी शरीर से अलग धडक रही थी.
सर्पराज तुरंत झुका.
उसने पूरी ताकत से तलवार उस छाया पर दे मारी.
छ्श्श्श्श!
धुएँ की आकृति दर्द से चीखी.
और हमेशा के लिए गायब हो गई.
यही तरीका है!
सर्पराज चिल्लाया.
अब पूरा युद्ध बदल गया.
सभी रक्षक छायाओं पर हमला करने लगे.
एक- एक करके धुएँ के योद्धा समाप्त होने लगे.
लेकिन.
उसी समय.
विस्मृत द्वार के भीतर से दूसरी भुजा भी बाहर निकल आई.
फिर.
एक विशाल कंधा.
पूरा आकाश अंधकार से ढक गया.
हरित की आवाज काँप रही थी.
नहीं.
अगर इसका सिर बाहर आ गया.
तो दूसरी मुहर हमेशा के लिए टूट जाएगी।
उसी क्षण.
दूर आकाश में एक नीली बिजली चमकी.
लेकिन यह साधारण बिजली नहीं थी.
वह सीधी निषिद्ध वन की ओर उतर रही थी.
और उसके भीतर.
किसी योद्धा की आकृति दिखाई दे रही थी.
नीली बिजली.
सीधे निषिद्ध वन के बीचों- बीच आ गिरी.
धडाऽऽऽम!
इतना शक्तिशाली विस्फोट हुआ कि युद्ध लड रहे सभी योद्धा कुछ क्षणों के लिए पीछे हट गए.
धूल का विशाल गुबार चारों ओर फैल गया.
जब धूल छँटी.
तो उसके बीच एक आकृति खडी थी.
लगभग सात फीट लंबा योद्धा.
नीले धातु का कवच.
पीठ पर दो विशाल तलवारें.
चेहरे पर चाँदी का मुखौटा.
और उसकी दोनों आँखों से हल्की नीली रोशनी निकल रही थी.
उसने बिना किसी की ओर देखे.
अपनी दोनों तलवारें निकाल लीं.
अगले ही पल.
वह बिजली की गति से धुएँ के योद्धाओं के बीच पहुँच गया.
ठाक!
छन्न!
धडाम!
सिर्फ कुछ ही सेकंड में.
दस धुएँ के योद्धा जमीन पर बिखर चुके थे.
लेकिन इस बार.
वे दोबारा नहीं उठे.
आर्यकेतु भी एक पल के लिए चौंक गए.
यह कौन है?
हरित ने गौर से देखा.
फिर उसकी आँखें फैल गईं.
असंभव.
आकाश- रक्षक!
उधर.
विशाल काला हाथ फिर आगे बढा.
इस बार उसने पूरे शरीर के साथ बाहर निकलने की कोशिश की.
विस्मृत द्वार की दीवारें टूटने लगीं.
आकाश- रक्षक ने ऊपर देखा.
फिर बिना समय गँवाए.
सीधे उस विशाल हाथ की ओर छलाँग लगा दी.
उसकी पहली तलवार कलाई पर गिरी.
ठाऽऽड्ग!
चिंगारियाँ उडीं.
काला हाथ कुछ इंच पीछे हट गया.
दूसरी तलवार.
सीधे उसी दरार पर गिरी जो शेषकेतु के भाले ने बनाई थी.
क्राऽऽक!
दरार पहले से दोगुनी बडी हो गई.
विशाल गर्जना हुई.
पूरा जंगल काँप उठा.
यही मौका है!
शेषकेतु गरजे.
सभी रक्षक!
एक साथ!
पूरा दल फिर टूट पडा.
भाले.
तलवारें.
तीर.
ऊर्जा.
सभी उसी दरार पर बरसने लगे.
सर्पराज भी दौडा.
लेकिन.
उसकी नजर युद्ध पर नहीं थी.
उसने देखा.
विशाल काले हाथ की कलाई पर.
एक टूटी हुई धातु की बेडी अब भी बंधी हुई थी.
उस बेडी पर वही नाग- चिह्न बना था.
जो उसके लटकन पर था.
हरित!
देखो!
हरित ने जैसे ही बेडी देखी.
वह स्तब्ध रह गया.
यह.
इसे नागलोक ने कैद किया था.
तो इसका मतलब.
यह राक्षस बाहर का नहीं.
हमारी दुनिया का ही है।
सर्पराज कुछ सोच ही रहा था.
कि अचानक काले हाथ ने अपनी मुट्ठी बंद कर ली.
फिर.
पूरी ताकत से जमीन पर प्रहार किया.
भूऊऊऊम!
भयानक विस्फोट हुआ.
सभी योद्धा हवा में उछल गए.
आकाश- रक्षक भी दूर जा गिरा.
काला हाथ अब आधे से अधिक बाहर निकल चुका था.
उसकी दूसरी भुजा भी दिखाई देने लगी.
इसी समय.
वह रहस्यमयी सफेद बालों वाला बालक पहली बार आगे बढा.
उसने सर्पराज की ओर देखा.
और कहा—
अगर इसे रोकना है.
तो तलवार से नहीं रुकेगा।
तो कैसे?
सर्पराज ने पूछा.
बालक ने दूर विस्मृत द्वार की चोटी की ओर इशारा किया.
वहाँ.
एक गोलाकार पत्थर जडा हुआ था.
उस पर सात खाली स्थान बने थे.
मुहर अभी पूरी तरह टूटी नहीं है।
जब तक सात मुहर- चिन्ह अपनी जगह वापस नहीं पहुँचते.
यह पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता।
वे सात चिन्ह कहाँ हैं?
बालक ने उत्तर दिया—
पूरे अनंतलोक में बिखरे हुए।
सर्पराज की आँखों में दृढता आ गई.
उसे पहली बार समझ आया.
यह युद्ध सिर्फ निषिद्ध वन तक सीमित नहीं है.
यह तो.
एक बहुत लंबी यात्रा की शुरुआत है.
लेकिन.
उसी क्षण.
काला हाथ अचानक उनकी ओर मुडा.
और उसकी हथेली के बीच.
एक विशाल काली आँख खुल गई.
उस आँख ने सीधे.
सर्पराज को देखना शुरू कर दिया.
विशाल हथेली के बीच खुली काली आँख.
सीधे सर्पराज को देख रही थी.
उसकी पुतली धीरे- धीरे सिकुडने लगी.
मानो.
उसने अपना शिकार चुन लिया हो.
सर्पराज!
आर्यकेतु गरजे.
वहाँ से हटो!
लेकिन देर हो चुकी थी.
काली आँख से एक काली किरण निकली.
वह बिजली से भी तेज गति से सर्पराज की ओर बढी.
धाऽऽम!
आकाश- रक्षक बीच में कूद पडा.
उसने दोनों तलवारें सामने क्रॉस कर दीं.
काली किरण उनसे टकराई.
चिंगारियाँ नहीं.
काली लपटें उठीं.
आकाश- रक्षक कई कदम पीछे फिसल गया.
उसकी दोनों तलवारों पर दरारें पड गईं.
यह शक्ति.
उसने पहली बार कहा,
सामान्य नहीं है।
विशाल कैदी ने फिर हमला किया.
इस बार उसकी पाँचों उँगलियाँ अलग- अलग दिशाओं में फैल गईं.
हर उँगली से धुएँ के सैकडों योद्धा निकलने लगे.
कुछ ही क्षणों में.
पूरा निषिद्ध वन फिर से शत्रुओं से भर गया.
दल बाँटो!
शेषकेतु गरजे.
पहला दल—रक्षकों के साथ!
दूसरा दल—घायल सैनिकों को बाहर निकालो!
कोई भी अकेला नहीं लडेगा!
युद्ध फिर भडक उठा.
आर्यकेतु लगातार तीन धुएँ के योद्धाओं से भिडे हुए थे.
शेषकेतु विशाल हाथ को रोकने की कोशिश कर रहे थे.
आकाश- रक्षक सीधा कलाई पर हमला कर रहा था.
लेकिन.
जितना समय बीत रहा था.
विशाल कैदी उतना ही बाहर निकल रहा था.
सर्पराज ने तलवार कसकर पकडी.
ऐसे लडते रहे.
तो हम हार जाएँगे।
उसने फिर विस्मृत द्वार की ओर देखा.
ऊपर जडा हुआ गोलाकार पत्थर.
अब हल्की नीली रोशनी छोड रहा था.
उसके भीतर.
सात खाली स्थान चमक रहे थे.
उसी समय.
हरित तेजी से उसके कंधे पर चढ गया.
देखो!
उसने द्वार के दाहिने हिस्से की ओर इशारा किया.
टूटे हुए पत्थरों के बीच.
एक छोटा- सा नीला मुहर- चिन्ह चमक रहा था.
वह क्या है?
सर्पराज ने पूछा.
पहला मुहर- चिन्ह!
हरित लगभग चिल्ला पडा.
अगर वह शत्रु के हाथ लग गया.
तो दूसरी मुहर को दोबारा बंद करना असंभव हो जाएगा!
सर्पराज बिना एक पल गँवाए दौड पडा.
लेकिन.
वह अकेला नहीं था.
पहाडी पर खडी काली आकृति भी उसी चिन्ह की ओर दौड रही थी.
दोनों की नजरें मिलीं.
दोनों समझ गए.
जो पहले पहुँचेगा.
वही युद्ध की दिशा बदल देगा.
बीच का रास्ता आसान नहीं था.
टूटती हुई जमीन.
धुएँ के योद्धा.
गिरते हुए पत्थर.
और विशाल कैदी की उँगलियाँ.
जो हर कुछ सेकंड में पूरी घाटी को कुचलने की कोशिश कर रही थीं.
सर्पराज ने दौडते हुए एक धुएँ के योद्धा की छाया पर वार किया.
वह तुरंत मिट गया.
दूसरा सामने आया.
सर्पराज नीचे झुका.
घूमकर वार किया.
दूसरा भी समाप्त.
लेकिन तभी.
विशाल कैदी की एक उँगली जमीन पर गिरी.
भूऊऊम!
सर्पराज के सामने गहरी खाई बन गई.
नीला मुहर- चिन्ह अब दूसरी ओर था.
और.
काली आकृति पहले ही छलाँग लगा चुकी थी.
नहीं!
सर्पराज पूरी ताकत से दौडा.
उसने खाई के किनारे से छलाँग लगाई.
कुछ क्षण.
वह हवा में था.
नीचे.
अंतहीन अंधेरा.
सामने.
चमकता हुआ पहला मुहर- चिन्ह.
उसी पल.
काली आकृति ने भी अपना हाथ बढाया.
दोनों के हाथ.
एक ही मुहर- चिन्ह की ओर बढ रहे थे.
दोनों हाथ...
एक साथ...
पहले मुहर-चिन्ह की ओर बढ़े।
समय मानो थम गया।
सर्पराज हवा में था।
दूसरी ओर काली आकृति भी छलांग लगा चुकी थी।
बस कुछ इंच का अंतर...
और उसी पर पूरे युद्ध का भविष्य निर्भर था।
टक!
सर्पराज की उँगलियाँ सबसे पहले मुहर-चिन्ह को छू गईं।
जैसे ही उसने उसे पकड़ा...
पूरा चिन्ह नीली आभा से चमक उठा।
उसकी हथेली पर नाग-चिह्न भी उसी प्रकाश से जगमगा उठा।
"यह इसे स्वीकार कर रहा है!"
हरित उत्साहित होकर चिल्लाया।
लेकिन अगले ही क्षण...
काली आकृति ने सर्पराज की कलाई पकड़ ली।
उसकी पकड़ लोहे जैसी कठोर थी।
"छोड़ दो..."
उसने पहली बार कहा।
उसकी आवाज़ भारी थी...
पर उसमें क्रोध नहीं था।
"यह तुम्हारे लिए नहीं है।"
सर्पराज ने कोई उत्तर नहीं दिया।
उसने अपनी पूरी ताकत से हाथ छुड़ाने की कोशिश की।
काली आकृति ने उसे हवा में ही घुमाकर चट्टान की ओर फेंक दिया।
धड़ाऽऽम!!
सर्पराज पत्थरों से टकराया।
पहला मुहर-चिन्ह उसके हाथ से छूटकर दूर जा गिरा।
"सर्पराज!"
आर्यकेतु उसकी ओर दौड़े।
लेकिन धुएँ के योद्धाओं ने उनका रास्ता रोक लिया।
काली आकृति धीरे-धीरे मुहर-चिन्ह की ओर बढ़ी।
हर कदम के साथ उसके चारों ओर काली ऊर्जा घूम रही थी।
तभी...
आकाश-रक्षक उसके सामने उतर आया।
दोनों आमने-सामने खड़े थे।
कुछ पल...
पूरा युद्ध जैसे रुक गया।
आकाश-रक्षक ने धीरे से कहा—
"तुम अभी भी उसकी सेवा कर रहे हो..."
काली आकृति हँसी।
"सेवा?"
"नहीं..."
"मैं केवल अपना अधूरा कार्य पूरा कर रहा हूँ।"
"तुम जानते हो..."
"अगर वह पूरी तरह मुक्त हो गया..."
"तो अनंतलोक समाप्त हो जाएगा।"
"अनंतलोक पहले ही सड़ चुका है।"
काली आकृति की आवाज़ और ठंडी हो गई।
"कभी-कभी..."
"नई दुनिया बनाने के लिए..."
"पुरानी दुनिया को मिटाना पड़ता है।"
इतना कहकर उसने अपनी तलवार निकाली।
काली धार...
जिस पर लाल बिजली दौड़ रही थी।
आकाश-रक्षक ने भी दोनों तलवारें संभाल लीं।
ठाऽऽऽङ्ग!!
दोनों की पहली टक्कर से ही आकाश में ऊर्जा का विशाल विस्फोट हुआ।
बादल फट गए।
दूर पहाड़ों की चोटियाँ टूटकर नीचे गिरने लगीं।
सर्पराज ने पहली बार महसूस किया...
यह युद्ध...
उसकी कल्पना से कहीं बड़ा है।
उसी समय...
हरित चिल्लाया—
"मुहर-चिन्ह!"
पहला मुहर-चिन्ह लड़ाई की कंपन से लुढ़कते हुए...
सीधे विस्मृत द्वार की ओर जा रहा था।
लेकिन...
वह द्वार तक नहीं पहुँचा।
बीच रास्ते में...
ज़मीन फट गई।
मुहर-चिन्ह उस दरार में गिर गया।
कुछ क्षणों तक...
सब शांत रहा।
फिर...
दरार के भीतर से...
नीली रोशनी निकलने लगी।
धरती फिर काँपी।
लेकिन इस बार...
कंपन द्वार से नहीं...
ज़मीन के नीचे से आ रहा था।
हरित का चेहरा सफेद पड़ गया।
"यह... असंभव है..."
"क्या हुआ?"
सर्पराज ने पूछा।
हरित की आवाज़ काँप रही थी।
"पहला मुहर-चिन्ह..."
"किसी गुप्त मार्ग में गिर गया है..."
"जिसका अस्तित्व केवल कथाओं में बताया गया था..."
"कौन-सा मार्ग?"
हरित ने धीरे-धीरे उस दरार की ओर देखा।
फिर बोला—
"नागऋषियों की भूलभुलैया।"
"जो उसके भीतर प्रवेश करता है..."
"वह या तो महान शक्ति लेकर लौटता है..."
"या फिर कभी वापस नहीं आता।"
उसी क्षण...
दरार अचानक और चौड़ी हो गई।
उसके भीतर से प्राचीन सीढ़ियाँ दिखाई देने लगीं...
जो अंधकार की अथाह गहराई में उतर रही थीं।
सर्पराज ने बिना एक पल गंवाए अपनी तलवार उठाई।
उसने आर्यकेतु, शेषकेतु और हरित की ओर देखा।
"अगर पहली मुहर वापस लानी है..."
"तो मुझे नीचे जाना होगा।"
आर्यकेतु ने गंभीर स्वर में कहा—
"हम ऊपर युद्ध संभालेंगे।"
"लेकिन याद रखना..."
"नीचे जो मिलेगा..."
"वह शायद इस युद्ध से भी अधिक खतरनाक होगा।"
सर्पराज ने सिर हिलाया।
वह दरार के किनारे पहुँचा।
नीचे...
सिर्फ़ अंधेरा था।
और उस अंधेरे से...
किसी प्राचीन जीव की धीमी साँसों जैसी आवाज़ आ रही थी।
सर्पराज ने एक गहरी साँस ली...
और पहला कदम...
नागऋषियों की भूलभुलैया की ओर बढ़ा।
सर्पराज ने पहला कदम सीढ़ियों पर रखा।
ठक...
पूरी भूलभुलैया में वह आवाज़ कई गुना गूँज गई।
अगले ही क्षण...
ऊपर की दरार अपने-आप बंद होने लगी।
"सर्पराज!"
आर्यकेतु की आवाज़ ऊपर से आई।
"जितनी जल्दी हो सके वापस आना!"
धड़ाम!
दरार पूरी तरह बंद हो गई।
अब चारों ओर केवल अंधकार था।
सर्पराज ने अपनी तलवार निकाली।
उसके नाग-चिह्न से हल्की नीली रोशनी निकलने लगी।
बस उतनी...
कि सामने की सीढ़ियाँ दिखाई दे सकें।
सीढ़ियाँ समाप्त होते ही...
एक विशाल भूमिगत नगर उसके सामने था।
लेकिन...
वह पूरी तरह उजड़ा हुआ था।
टूटे हुए स्तंभ।
गिरी हुई मूर्तियाँ।
सूखी जलधाराएँ।
और हर दीवार पर...
सर्पों की प्राचीन आकृतियाँ उकेरी हुई थीं।
"क्या यही..."
सर्पराज बुदबुदाया।
"...नागऋषियों की भूलभुलैया है?"
"नहीं।"
एक धीमी आवाज़ गूँजी।
"यह तो केवल उसका प्रवेशद्वार है।"
सर्पराज तुरंत मुड़ा।
कोई नहीं था।
फिर वही आवाज़...
इस बार दूसरी दिशा से।
"तलवार निकालकर पीछे देखने से..."
"यहाँ कोई नहीं मिलता।"
सर्पराज ने चारों ओर नज़र दौड़ाई।
अब भी कोई दिखाई नहीं दिया।
तभी...
उसके पैरों के नीचे ज़मीन पर बने नाग-चिह्न चमक उठे।
पूरी फ़र्श नीली रोशनी से भर गई।
और...
उसके सामने हवा में एक पारदर्शी आकृति बनने लगी।
लंबी सफेद दाढ़ी।
विशाल नागमुकुट।
हाथ में दंड।
लेकिन पूरा शरीर...
प्रकाश से बना हुआ।
"मैं..."
उसने शांत स्वर में कहा।
"...ऋषि वासुकिरत्न की स्मृति हूँ।"
"क्या आप जीवित हैं?"
सर्पराज ने पूछा।
"नहीं।"
"मैं केवल उस चेतना का अंश हूँ..."
"जिसे इस भूलभुलैया की रक्षा के लिए छोड़ा गया था।"
सर्पराज ने बिना समय गंवाए पूछा—
"पहला मुहर-चिन्ह कहाँ है?"
ऋषि की आकृति मुस्कुराई।
"जो सीधे उत्तर खोजता है..."
"उसे यहाँ कभी उत्तर नहीं मिलता।"
इतना कहते ही...
पूरे प्रांगण की दीवारें हिलने लगीं।
भारी पत्थर खिसकने लगे।
और तीन विशाल द्वार उसके सामने खुल गए।
पहले द्वार पर उकेरा था—
"बल"
दूसरे पर—
"बुद्धि"
तीसरे पर—
"सत्य"
ऋषि बोले—
"इन तीनों में से केवल एक मार्ग..."
"तुम्हें पहले मुहर-चिन्ह तक ले जाएगा।"
"और बाकी दो?"
"मृत्यु नहीं देंगे..."
"लेकिन शायद..."
"तुम्हें हमेशा के लिए यहीं रोक दें।"
सर्पराज तीनों द्वारों को ध्यान से देखने लगा।
पहला द्वार लोहे का था।
उस पर गहरे वारों के निशान थे।
मानो अनगिनत योद्धा उसे तोड़ने की कोशिश कर चुके हों।
दूसरा द्वार सफेद पत्थर का था।
उस पर हजारों छोटे-छोटे प्रतीक उकेरे थे।
हर प्रतीक बदलता हुआ दिखाई दे रहा था।
तीसरा द्वार...
पूरी तरह काले दर्पण जैसा था।
उसमें सर्पराज का प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था।
लेकिन...
प्रतिबिंब मुस्कुरा रहा था।
जबकि सर्पराज बिल्कुल स्थिर खड़ा था।
उसने तुरंत एक कदम पीछे लिया।
प्रतिबिंब...
अब भी मुस्कुरा रहा था।
"यह..."
सर्पराज ने तलवार संभाली।
"...क्या है?"
ऋषि की आवाज़ गूँजी—
"यही कारण है..."
"कि इस भूलभुलैया से बहुत कम लोग लौटे।"
अचानक...
काले दर्पण में दिख रहा प्रतिबिंब आगे बढ़ा।
और...
धीरे-धीरे दर्पण से बाहर निकल आया।
अब...
सर्पराज के सामने...
उसका ही दूसरा रूप खड़ा था।
चेहरा वही।
कद वही।
हथियार वही।
लेकिन...
उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
उसने मुस्कुराकर कहा—
"तुम मुहर लेने आए हो..."
"मैं..."
"उसे कभी जाने नहीं दूँगा।"
उसी क्षण...
तीनों द्वार अपने-आप बंद हो गए।
और पूरा प्रांगण...
एक विशाल युद्धभूमि में बदलने लगा।
पूरा प्रांगण काँप उठा।
तीनों द्वार पत्थर की दीवारों में समा गए।
चारों ओर फैली नीली रोशनी अचानक बुझ गई।
अब केवल दो आकृतियाँ आमने-सामने खड़ी थीं।
सर्पराज...
और...
उसकी काली छाया।
छाया ने तलवार घुमाई।
"मुझे हराकर ही आगे बढ़ पाओगे।"
सर्पराज ने उत्तर नहीं दिया।
उसने अपनी पकड़ मजबूत की।
वह जानता था—
बिना समझे हमला करना भूलभुलैया की पहली गलती हो सकती है।
अचानक...
छाया गायब हो गई।
"कहाँ...?"
सर्पराज ने चारों ओर देखा।
छन्न!
पीछे से तलवार टकराई।
सर्पराज समय रहते मुड़ा।
दोनों तलवारें भिड़ीं।
चिंगारियाँ उड़ीं।
छाया मुस्कुराई।
"तुम्हारी हर चाल..."
"मुझे पहले से पता है।"
उसने लगातार पाँच वार किए।
ऊपर...
दाएँ...
नीचे...
बाएँ...
सीधा हृदय की ओर।
सर्पराज ने सभी वार रोक लिए।
लेकिन हर टक्कर के साथ उसकी हथेलियाँ सुन्न होती जा रही थीं।
"यह मेरी हर तकनीक कैसे जानता है?"
उसने दूरी बनाई।
तभी उसे एहसास हुआ—
छाया वही वार कर रही थी...
जो वह स्वयं सोच रहा था।
"यह मेरे शरीर की नहीं..."
"मेरे विचारों की नकल कर रही है।"
ऊपर हवा में खड़े ऋषि वासुकिरत्न की चेतना ने कुछ नहीं कहा।
वह केवल देख रहे थे।
सर्पराज ने आँखें बंद कर लीं।
छाया हँस पड़ी।
"डर गए?"
अगले ही पल...
वह पूरी गति से दौड़ी।
लेकिन...
सर्पराज ने आँखें नहीं खोलीं।
उसने केवल अपने कानों से आवाज़ सुनी।
हवा के बहाव को महसूस किया।
और...
बिना देखे तलवार घुमा दी।
ठाऽऽङ्ग!!
पहली बार...
छाया का वार रुक गया।
उसकी मुस्कान गायब हो गई।
"अच्छा..."
"तो तुमने सोचना बंद कर दिया।"
सर्पराज ने धीरे से आँखें खोलीं।
"तुम मेरे विचार पढ़ सकते हो..."
"लेकिन मेरे निर्णय नहीं..."
इस बार हमला सर्पराज ने किया।
एक...
दो...
तीन...
लगातार तेज़ वार।
छाया पीछे हटती गई।
लेकिन अचानक...
उसने अपना बायाँ हाथ उठाया।
काली ऊर्जा की पाँच जंजीरें ज़मीन से निकलीं।
वे सीधे सर्पराज के पैरों से लिपट गईं।
सर्पराज ने तलवार से उन्हें काटने की कोशिश की।
कोई असर नहीं।
छाया धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ी।
"तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी..."
"तुम्हारी ताकत नहीं है।"
"तो क्या है?"
"तुम हर किसी को बचाना चाहते हो।"
इतना कहते ही...
चारों ओर का दृश्य बदल गया।
प्रांगण गायब हो गया।
अब...
सर्पराज अपने गाँव में खड़ा था।
आग लगी हुई थी।
लोग चीख रहे थे।
बच्चे मदद के लिए पुकार रहे थे।
"सर्पराज!"
"हमें बचाओ!"
उसने घबराकर चारों ओर देखा।
"यह..."
छाया की आवाज़ गूँजी—
"भूलभुलैया केवल शरीर की परीक्षा नहीं लेती..."
"यह तुम्हारे मन को भी तोड़ती है।"
सर्पराज गाँव की ओर दौड़ा।
लेकिन...
कुछ कदम बाद ही...
उसे हरित की बात याद आई।
"भूलभुलैया जो दिखाती है... उस पर कभी तुरंत विश्वास मत करना।"
वह वहीं रुक गया।
उसने एक गहरी साँस ली।
आँखें बंद कीं।
और अपनी तलवार ज़मीन में गाड़ दी।
"अगर यह सत्य है..."
"तो मैं लौटकर सबको बचाऊँगा।"
"अगर यह भ्रम है..."
"तो मैं इसमें नहीं फँसूँगा।"
अचानक...
पूरा गाँव काँच की तरह टूटने लगा।
आग...
लोग...
घर...
सब धुएँ में बदल गए।
फिर वही प्रांगण सामने था।
छाया पहली बार चौंकी हुई दिखाई दी।
"तुमने..."
"माया तोड़ दी?"
ऋषि वासुकिरत्न की आवाज़ पहली बार गर्व से गूँजी—
"पहली परीक्षा में बहुतों ने तलवार चलाई..."
"बहुतों ने बल दिखाया..."
"लेकिन बहुत कम लोग भ्रम को पहचान पाए।"
उसी क्षण...
छाया के सीने पर एक सुनहरी रेखा उभरी।
वह धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।
लेकिन...
वह नष्ट नहीं हुई।
उसने मुस्कुराकर कहा—
"यह केवल पहली परीक्षा थी..."
"अभी दो और बाकी हैं..."
इतना कहते ही...
पूरा प्रांगण फिर बदलने लगा।
तीनों विशाल द्वार दोबारा प्रकट हुए।
लेकिन अब...
हर द्वार के पीछे से...
किसी विशाल जीव की गर्जना सुनाई दे रही थी।
ऋषि वासुकिरत्न ने अपना दंड उठाया।
उनकी आवाज़ पूरे भूलभुलैया में गूँज उठी—
"अब आरंभ होगी दूसरी परीक्षा..."
"जहाँ केवल सही मार्ग चुनना पर्याप्त नहीं होगा..."
"तुम्हें उस मार्ग के रक्षक को भी हराना होगा।"
तीनों विशाल द्वारों के पीछे से आती गर्जनाएँ पूरे भूमिगत नगर को हिला रही थीं.
रिषि वासुकिरत्न ने अपना दंड उठाया.
तीनों द्वारों पर बने अक्षर एक साथ चमक उठे—
बल.
बुद्धि.
सत्य.
दूसरी परीक्षा आरम्भ हो चुकी है।
उनकी गंभीर आवाज गूँजी.
अब कोई भी द्वार चुनने के बाद लौट नहीं सकेगा.
सर्पराज ने तीनों द्वारों को ध्यान से देखा.
उसी क्षण.
उसकी हथेली पर बना नाग- चिह्न हल्का- सा चमका.
और उसकी रोशनी.
सीधे' बल' वाले द्वार की ओर मुड गई.
रिषि ने कुछ नहीं कहा.
लेकिन उनकी आँखों में एक हल्की मुस्कान उभर आई.
तो पहला मार्ग स्वयं तुम्हें बुला रहा है।
घर्ररर.
लोहे का विशाल द्वार धीरे- धीरे खुला.
अंदर से तपती हुई हवा बाहर आई.
ऐसा लगा मानो किसी ज्वालामुखी का मुख खुल गया हो.
सर्पराज ने तलवार कसकर पकडी और भीतर प्रवेश कर गया.
जैसे ही उसने सीमा पार की.
पीछे का द्वार अपने- आप बंद हो गया.
पूरा कक्ष गोलाकार था.
दीवारें काले पत्थर की थीं.
बीच में लावा की एक विशाल झील उबल रही थी.
उसके बीच.
पत्थर का एक गोल मंच था.
और उस मंच पर.
बारह फीट ऊँचा एक योद्धा ध्यानमग्न बैठा था.
उसका पूरा शरीर गहरे लाल पत्थर जैसा था.
दोनों हाथों में विशाल गदा.
पीठ पर टूटी हुई जंजीरें.
चेहरे पर कोई भाव नहीं.
सर्पराज ने एक कदम आगे बढाया.
धम्म.
योद्धा की आँखें खुल गईं.
उनमें आग जल रही थी.
तीन सौ तिरपन वर्ष.
उसकी आवाज गुफा में गूँज उठी.
इतने वर्षों बाद.
किसी ने बल के द्वार में प्रवेश करने का साहस किया है।
सर्पराज ने तलवार उठाई.
मैं पहली मुहर लेने आया हूँ।
योद्धा धीरे- धीरे खडा हुआ.
उसके खडे होते ही पूरा पत्थर का मंच काँपने लगा.
मुहर.
शक्ति से नहीं मिलती।
उसने अपनी गदा जमीन पर मारी.
भूऊऊम!
लावा की झील से आग के दर्जनों स्तंभ उठ खडे हुए.
उन लपटों के बीच.
लोहे की मोटी जंजीरों से बँधी एक विशाल घंटी दिखाई दी.
योद्धा ने उसकी ओर इशारा किया.
नियम सरल है।
जब तक वह घंटी नहीं बजेगी.
यह द्वार तुम्हें स्वीकार नहीं करेगा।
सर्पराज ने घंटी तक जाने का रास्ता देखा.
पत्थर के संकरे स्तंभ.
जो लावा के ऊपर बने थे.
हर स्तंभ कुछ- कुछ क्षण बाद पिघलने लगता था.
एक भी गलत कदम.
सीधे उबलते लावा में गिरा सकता था.
और तुम?
सर्पराज ने पूछा.
योद्धा मुस्कुराया.
मैं.
इस मार्ग का रक्षक हूँ।
इतना कहते ही.
उसने अपनी विशाल गदा पूरी शक्ति से घुमाई.
गदा हवा चीरती हुई सर्पराज की ओर बढी.
सर्पराज नीचे झुका.
गदा उसके सिर के ऊपर से निकलकर पीछे की दीवार से टकराई.
धडाऽऽऽम!
पूरा पत्थर का कक्ष हिल गया.
दीवारों में दरारें पड गईं.
लावा और तेजी से उबलने लगा.
सर्पराज समझ चुका था—
इस रक्षक को हराना ही पर्याप्त नहीं.
उसे युद्ध करते हुए.
उस घंटी तक भी पहुँचना होगा.
रक्षक ने दूसरी बार गदा उठाई.
लेकिन इस बार.
उसके पीछे लावा की झील से.
तीन अग्निमय पशु बाहर निकल आए.
एक विशाल सिंह.
एक दो- मुँहा भेडिया.
और.
एक अग्नि- अजगर.
तीनों ने एक साथ सर्पराज की ओर देखा.
और अगले ही क्षण.
पूरा कक्ष उनकी गर्जनाओं से गूँज उठा.
तीनों अग्निमय पशु.
एक साथ सर्पराज पर टूट पडे.
सबसे पहले.
विशाल सिंह ने छलांग लगाई.
उसके पंजे पत्थर के मंच को चीरते हुए आगे बढे.
धाऽऽक!
सर्पराज बाईं ओर लुढक गया.
सिंह का पंजा वहीं गिरा जहाँ एक क्षण पहले वह खडा था.
पत्थर का पूरा हिस्सा टूटकर सीधे लावा में गिर गया.
अभी वह संभल भी नहीं पाया था कि.
दो- मुँहा भेडिया दोनों दिशाओं से आग उगलता हुआ उसकी ओर दौडा.
एक सिर सामने से हमला कर रहा था.
दूसरा पीछे घूमकर रास्ता काट रहा था.
सर्पराज ने तलवार घुमाई.
पहला वार.
छन्न!
तलवार भेडिए की गर्दन से टकराई.
लेकिन वह धुएँ की तरह बिखरकर तुरंत फिर बन गया.
भ्रम?
सर्पराज ने सोचा.
नहीं.
रक्षक की भारी आवाज गूँजी.
ये अग्नि- प्राणी हैं।
जब तक इनका स्रोत जीवित है.
ये बार- बार जन्म लेते रहेंगे।
सर्पराज की नजर तुरंत रक्षक पर गई.
रक्षक की गदा के शीर्ष पर तीन लाल मणियाँ जडी थीं.
हर बार जब कोई अग्नि- प्राणी टूटता.
उन मणियों में से एक चमक उठती.
तो स्रोत.
वह गदा है।
उसी क्षण.
अग्नि- अजगर ने अपना विशाल मुँह खोला.
भीषण अग्निधारा पूरे पुल पर फैल गई.
पत्थर के स्तंभ लाल होकर पिघलने लगे.
सर्पराज तेजी से एक स्तंभ से दूसरे पर कूदा.
उसके पीछे पूरा रास्ता लावा में समाता जा रहा था.
अब लौटने का कोई मार्ग नहीं था.
रक्षक मुस्कुराया.
भागते रहो.
यही अधिकांश योद्धाओं का अंत होता है।
सर्पराज अचानक रुक गया.
उसने चारों ओर देखा.
बीच में घंटी.
चारों ओर लावा.
रक्षक सबसे दूर.
तीनों अग्नि- प्राणी लगातार हमला कर रहे थे.
सीधे युद्ध में जीतना कठिन था.
उसे रणनीति बदलनी थी.
सिंह फिर झपटा.
इस बार सर्पराज पीछे नहीं हटा.
वह ठीक अंतिम क्षण में नीचे झुका.
और सिंह की गति का उपयोग करते हुए उसके शरीर पर पैर रखकर हवा में उछल गया.
सीधे.
रक्षक की ओर.
अच्छा!
रक्षक पहली बार प्रसन्न दिखाई दिया.
अब तुम सोचने लगे हो।
सर्पराज हवा में ही तलवार उठाकर रक्षक की गदा पर वार करने पहुँचा.
ठाऽऽड्ग!
भयानक टक्कर हुई.
गदा पर पहली बार एक महीन दरार उभरी.
उसकी एक लाल मणि हल्की- सी झिलमिलाई.
उसी क्षण.
अग्नि- सिंह दर्द से दहाडा.
उसके अगले पंजे का एक हिस्सा गायब हो गया.
सही पहचाना.
सर्पराज ने मन ही मन कहा.
लेकिन अगले ही पल.
रक्षक ने खाली हाथ से सर्पराज को पकड लिया.
उसकी पकड इतनी शक्तिशाली थी कि सर्पराज की साँस रुकने लगी.
केवल रहस्य जान लेना.
रक्षक बोला,
विजय नहीं होता।
उसने पूरी ताकत से सर्पराज को लावा की ओर फेंक दिया.
सर्पराज हवा में घूमता हुआ सीधे उबलते लावा की ओर गिरने लगा.
नीचे.
सैकडों डिग्री तापमान वाली अग्नि.
ऊपर.
तीनों अग्नि- प्राणी फिर उसकी ओर झपट रहे थे.
गिरते समय उसकी नजर.
लावा के बीच खडी उस विशाल घंटी पर पडी.
अब उसे पहली बार स्पष्ट दिखाई दिया—
घंटी की जंजीरों पर भी वही नाग- चिह्न अंकित था.
जो उसकी हथेली और लटकन पर बना था.
उसी क्षण.
उसकी हथेली का नाग- चिह्न तेज नीली रोशनी से चमकने लगा.
और घंटी.
धीरे- धीरे उसी रोशनी का उत्तर देने लगी.
रक्षक की आँखें पहली बार फैल गईं.
उसने अविश्वास से कहा—
नहीं.
यह कैसे संभव है?
सर्पराज लावा से बस कुछ ही हाथ दूर था.
और उसकी हथेली की नीली आभा.
अब पूरी घंटी को अपने प्रकाश में ढँक चुकी थी.
सर्पराज.
तेजी से लावा की ओर गिर रहा था.
उबलती अग्नि अब उसके पैरों से केवल कुछ हाथ दूर थी.
उसी क्षण.
उसकी हथेली पर बना नाग- चिह्न प्रचंड प्रकाश से चमक उठा.
नीली ऊर्जा उसकी बाँह से निकलकर सीधे उस विशाल घंटी तक पहुँची.
टन्न्न्न.
घंटी बिना किसी स्पर्श के स्वयं बज उठी.
उसकी ध्वनि पूरे अग्नि- कक्ष में गूँज गई.
एक पल.
सब कुछ थम गया.
लावा की लहरें स्थिर हो गईं.
अग्नि- प्राणियों की गर्जना रुक गई.
रक्षक की गदा हवा में ही थम गई.
फिर.
घंटी से निकली ध्वनि नीली तरंगों में बदल गई.
वे तरंगें पूरे कक्ष में फैलने लगीं.
जैसे ही पहली तरंग अग्नि- सिंह से टकराई.
उसका अग्निमय शरीर शांत होने लगा.
वह दहाडा नहीं.
बल्कि धीरे- धीरे घुटनों पर बैठ गया.
दो- मुँहा भेडिया.
अग्नि- अजगर.
दोनों भी उसी प्रकार शांत हो गए.
उनकी आँखों की लाल चमक बुझ गई.
यह.
सर्पराज ने आश्चर्य से देखा.
रक्षक ने गहरी साँस ली.
उसने पहली बार अपनी गदा नीचे रख दी.
तीन सौ तिरपन वर्षों में.
उसने धीमे स्वर में कहा,
किसी ने घंटी को शक्ति से नहीं.
वंश की पहचान से जगाया है।
सर्पराज धीरे से पत्थर के मंच पर उतरा.
उसे समझ नहीं आ रहा था कि अभी क्या हुआ.
रक्षक उसकी ओर बढा.
इस बार उसके कदमों में शत्रुता नहीं थी.
तुमने युद्ध नहीं जीता।
तुमने परीक्षा पूरी की है।
सर्पराज ने तलवार नीचे कर दी.
तो पहली मुहर कहाँ है?
रक्षक ने अपनी विशाल गदा उठाई.
उसके शीर्ष पर जडी तीन लाल मणियाँ एक- एक करके बुझने लगीं.
फिर.
गदा बीच से टूट गई.
उसके भीतर से.
एक छोटी- सी नीली स्फटिक- शिला बाहर निकली.
उसके केंद्र में.
सर्पिल आकार का सुनहरा चिह्न चमक रहा था.
यह.
रक्षक बोला,
पहली मुहर नहीं।
सर्पराज चौंक गया.
यह.
पहली कुंजी है।
कुंजी?
सात मुहरें सीधे प्राप्त नहीं की जा सकतीं।
हर मुहर तक पहुँचने के लिए पहले उसकी कुंजी अर्जित करनी होती है।
सर्पराज ने स्फटिक अपने हाथ में लिया.
जैसे ही उसने उसे छुआ.
उसके सामने हवा में एक प्राचीन नक्शा उभर आया.
नक्शे पर सात चमकते बिंदु दिखाई दिए.
छह धुँधले थे.
लेकिन.
एक बिंदु तेजी से चमक रहा था.
वह.
भूलभुलैया के भीतर ही था.
रक्षक ने कहा—
अब तुम्हें असली पहली मुहर तक जाने का अधिकार मिल गया है।
उसी क्षण.
पूरा कक्ष काँप उठा.
भूऊऊऊम!
दीवारों में दरारें पडने लगीं.
छत से विशाल पत्थर गिरने लगे.
रिषि वासुकिरत्न की आवाज पूरे कक्ष में गूँजी—
समय समाप्त हो चुका है!
किसी ने बाहर से भूलभुलैया की सुरक्षा तोड दी है!
रक्षक का चेहरा गंभीर हो गया.
वे यहाँ तक पहुँच गए.
कौन?
सर्पराज ने पूछा.
रक्षक ने पहली बार भय से ऊपर देखा.
जो पहली कुंजी की तलाश में सदियों से भटक रहे थे.
अचानक.
अंधेरे गलियारे से भारी कदमों की आवाज आने लगी.
ठक.
ठक.
ठक.
हर कदम के साथ पूरा कक्ष काँप रहा था.
कुछ ही क्षण बाद.
अंधकार से तीन विशाल योद्धा बाहर आए.
बारह- बारह फीट लंबे.
काले धातु के कवच में ढके हुए.
हर एक के हाथ में अलग हथियार—
एक के पास कुल्हाडा.
एक के पास भाला.
और तीसरे के पास एक विशाल हथौडा.
उनके सीने पर एक ही प्रतीक बना था—
टूटी हुई नाग- मुद्रा.
रक्षक की आवाज भारी हो गई.
पीछे हटो, सर्पराज.
ये भूलभुलैया के रक्षक नहीं हैं.
ये मुहर- भंजक हैं।
तीनों ने बिना कुछ कहे अपने हथियार उठाए.
और उनकी लाल आँखें.

सीधे सर्पराज के हाथ में पकडी पहली कुंजी पर टिक गईं. 

तीनों विशाल योद्धा...
धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे।
उनके भारी कदमों की गूँज से पूरी भूलभुलैया काँप रही थी।
हर कदम के साथ...
पत्थरों की छत से धूल झरने लगी।
रक्षक ने अपना टूटा हुआ गदा-दंड उठाया।
अब वह पहले जितना शक्तिशाली नहीं था।
फिर भी...
वह सर्पराज के सामने आकर खड़ा हो गया।
"कुंजी मुझे दे दो।"
उसने कहा।
"क्यों?"
सर्पराज ने तलवार संभालते हुए पूछा।
"क्योंकि..."
"अब उनका लक्ष्य तुम हो।"
सर्पराज ने अपनी मुट्ठी और कस ली।
पहली कुंजी उसकी हथेली में हल्की-हल्की धड़क रही थी।
मानो वह जीवित हो।
तभी...
तीनों मुहर-भंजकों में से सबसे आगे खड़े योद्धा ने अपना विशाल हथौड़ा ज़मीन पर मारा।
धाऽऽऽम!!
पूरा कक्ष हिल उठा।
पत्थर का फर्श कई जगह से फट गया।
लावा की पतली धाराएँ उन दरारों से बाहर निकलने लगीं।
"आदेश..."
उसकी भारी, धातु जैसी आवाज़ गूँजी।
"पहली कुंजी वापस लो।"
"साक्षी जीवित रहे या नहीं..."
"कोई अंतर नहीं पड़ता।"
इतना सुनते ही...
तीनों एक साथ टूट पड़े।
सबसे पहले...
भाले वाला योद्धा बिजली जैसी गति से आगे बढ़ा।
उसका बारह फ़ीट लंबा भाला सीधा सर्पराज के सीने की ओर आया।
ठाऽऽङ्ग!!
सर्पराज ने तलवार से वार रोका।
लेकिन...
उसकी पूरी देह पीछे फिसल गई।
उसके पैरों के नीचे पत्थर टूटने लगे।
"इतनी शक्ति..."
सर्पराज ने दाँत भींच लिए।
उसी समय...
कुल्हाड़ी वाला मुहर-भंजक दाईं ओर से घूमकर आया।
उसकी कुल्हाड़ी हवा को चीरती हुई नीचे गिरी।
रक्षक बीच में कूद पड़ा।
धड़ाऽऽम!!
कुल्हाड़ी और दंड की टक्कर से चिंगारियों का विस्फोट हुआ।
रक्षक पीछे धकेल दिया गया।
उसके दोनों घुटने ज़मीन में धँस गए।
तीसरा...
हथौड़ा लिए विशाल योद्धा...
अब तक बिल्कुल शांत खड़ा था।
उसने केवल अपनी लाल आँखों से सर्पराज को देखा।
फिर...
अपना बायाँ हाथ आगे बढ़ाया।
उसकी हथेली में काले रंग का एक गोल चिह्न चमकने लगा।
रक्षक का चेहरा बदल गया।
"नहीं..."
"उसकी ओर मत देखना!"
लेकिन चेतावनी देर से पहुँची।
सर्पराज की नज़र अनायास उस काले चिह्न पर पड़ गई।
एक क्षण में...
पूरा कक्ष गायब हो गया।
अब वह एक सूने मैदान में खड़ा था।
चारों ओर धुआँ था।
ज़मीन पर हजारों नाग-योद्धाओं के शव बिखरे पड़े थे।
टूटे हुए ध्वज...
बिखरे हुए अस्त्र...
और रक्त से लाल हुई धरती।
दूर...
एक सिंहासन दिखाई दिया।
उस पर कोई बैठा था।
चेहरा धुँधला था...
लेकिन उसकी आँखें...
ठीक सर्पराज जैसी थीं।
"स्वागत है..."
उस आकृति की आवाज़ आई।
"कौन हो तुम?"
सर्पराज ने पूछा।
आकृति धीरे-धीरे सिंहासन से उठी।
धुआँ हटने लगा।
उसके शरीर पर प्राचीन नाग-सम्राट का कवच था।
गले में वही लटकन...
जो सर्पराज के पास थी।
वह मुस्कुराया।
"तुम उत्तर खोज रहे हो..."
"और मैं..."
"तुम्हारा भविष्य हूँ।"
उसी क्षण...
वास्तविक दुनिया में...
सर्पराज बिल्कुल स्थिर खड़ा था।
उसकी आँखों की पुतलियाँ काली पड़ चुकी थीं।
पहली कुंजी उसके हाथ से धीरे-धीरे छूट रही थी।
हथौड़ा लिए मुहर-भंजक ने धीमे कदमों से उसकी ओर बढ़ते हुए कहा—
"भ्रम-जाल सफल हुआ..."
"अब कुंजी ले लो।"
रक्षक ने पूरी ताकत से दहाड़ लगाई—
"सर्पराज!"
"जागो!"
लेकिन...
सर्पराज तक उसकी आवाज़ पहुँच ही नहीं रही थी।
धुएँ से ढका हुआ युद्धक्षेत्र...
हजारों मृत नाग-योद्धाओं की निस्तब्धता...
और उस वीरान मैदान के बीच...
वह प्राचीन सिंहासन।
सर्पराज की निगाह सामने खड़े उस रहस्यमयी पुरुष पर टिक गई।
उसका चेहरा...
अब पूरी तरह स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
वह सर्पराज जैसा नहीं था...
लेकिन उसके ललाट पर वही नाग-चिह्न अंकित था।
उसकी आँखों में वर्षों का अनुभव था...
और चेहरे पर एक अजीब-सी उदासी।
"तुमने कहा..."
सर्पराज ने तलवार उठाई,
"...तुम मेरा भविष्य हो?"
वह मुस्कुराया।
"भविष्य..."
"या चेतावनी।"
"तुम कौन हो?"
उसने कोई उत्तर नहीं दिया।
बल्कि धीरे-धीरे सिंहासन की सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा।
हर कदम के साथ...
ज़मीन पर पड़े मृत योद्धाओं के कवच चमकने लगे।
"एक प्रश्न का उत्तर दो।"
उसने कहा।
"अगर एक मुहर बचाने के लिए..."
"तुम्हें सौ निर्दोष लोगों की बलि देनी पड़े..."
"क्या तुम दोगे?"
सर्पराज बिना रुके बोला—
"नहीं।"
"तो मुहर टूट जाएगी।"
"फिर भी नहीं।"
"और अगर उन सौ लोगों की जगह..."
"पूरा राज्य हो?"
सर्पराज कुछ क्षण चुप रहा।
"मैं दूसरा रास्ता खोजूँगा।"
उस व्यक्ति ने सिर झुका लिया।
"हर उत्तर..."
"यही था।"
"किसका?"
उसने सीधे सर्पराज की आँखों में देखा।
"उन सभी का..."
"जो इस भूलभुलैया में तुमसे पहले आए थे।"
अचानक...
पूरा मैदान काँप उठा।
दूर खड़े मृत नाग-योद्धा...
एक-एक करके उठने लगे।
उनकी आँखें खाली थीं।
कवच टूटे हुए थे।
लेकिन...
वे सभी सर्पराज की ओर बढ़ रहे थे।
सैकड़ों...
फिर हजारों...
सर्पराज ने तलवार कसकर पकड़ी।
"अगर यही परीक्षा है..."
"तो मैं तैयार हूँ।"
वह दौड़ पड़ा।
पहला वार।
एक मृत योद्धा गिरा।
दूसरा।
तीसरा।
चौथा।
लेकिन...
हर बार जब एक गिरता...
दो और खड़े हो जाते।
कुछ ही क्षणों में...
सर्पराज चारों ओर से घिर गया।
उधर...
वास्तविक दुनिया में...
मुहर-भंजक का हाथ...
पहली कुंजी से बस कुछ इंच दूर था।
रक्षक घायल होने के बावजूद उसकी ओर दौड़ा।
कुल्हाड़ी वाले मुहर-भंजक ने रास्ता रोक लिया।
धाऽऽङ्ग!!
दोनों की भिड़ंत से पत्थर चटक गए।
रक्षक पीछे हट गया।
भाले वाला मुहर-भंजक...
अब सीधे बेहोश खड़े सर्पराज की ओर बढ़ रहा था।
ऋषि वासुकिरत्न की चेतना ने पहली बार हस्तक्षेप किया।
उन्होंने अपना दंड ऊँचा उठाया।
पूरी भूलभुलैया में नीले मंत्रचिह्न चमक उठे।
"मैं केवल तीन श्वासों तक..."
"भ्रम-जाल को रोक सकता हूँ।"
नीली ऊर्जा की एक लहर सर्पराज के शरीर से टकराई।
भ्रमलोक में...
सर्पराज ने अचानक एक घंटी की ध्वनि सुनी।
टन्न्न्न...
उसे वही अग्नि-कक्ष वाली घंटी याद आई।
उस रहस्यमयी पुरुष का चेहरा पहली बार बदल गया।
"वे..."
"तुम तक पहुँच गए?"
सर्पराज ने चारों ओर देखा।
मृत योद्धा धीमे होने लगे।
धुआँ हल्का पड़ने लगा।
उसे समझ आ गया—
यह दुनिया पूरी तरह वास्तविक नहीं है।
लेकिन...
उसी क्षण...
उस रहस्यमयी पुरुष ने अपना दाहिना हाथ उठाया।
आकाश फट गया।
उस दरार से...
एक विशाल काला सर्प नीचे उतरने लगा।
उसकी लंबाई इतनी थी कि उसका शरीर बादलों के पार तक फैला हुआ था।
उसकी आँखें लाल थीं...
और उसके माथे पर भी वही नाग-चिह्न अंकित था।
उसने नीचे झुककर...
सीधे सर्पराज की ओर देखा।
और पहली बार...
उसने मनुष्यों की भाषा में कहा—
"यदि तुम सत्य जानना चाहते हो..."
"तो पहले जीवित बचो।"
उसी क्षण...
वास्तविक दुनिया में...
ऋषि वासुकिरत्न की नीली ऊर्जा टूटने लगी।
उन्होंने दहाड़कर कहा—
"सर्पराज!"
"केवल एक श्वास शेष है!"
मुहर-भंजक का हाथ...
अब पहली कुंजी को छू चुका था।
मुहर-भंजक की उँगलियाँ...
पहली कुंजी को छू चुकी थीं।
उसके धातु के दस्ताने से काली ऊर्जा निकली...
जो कुंजी को अपने भीतर समेटने लगी।
रक्षक पूरी शक्ति से उसकी ओर दौड़ा।
लेकिन...
भाले वाले मुहर-भंजक ने रास्ता रोक लिया।
धाऽऽङ्ग!
भाले और दंड की टक्कर से पत्थर बिखर गए।
रक्षक फिर पीछे धकेल दिया गया।
ऋषि वासुकिरत्न की चेतना काँप रही थी।
उनके शरीर की रोशनी क्षीण होने लगी।
"अब..."
उन्होंने धीमे स्वर में कहा,
"मैं भ्रम-जाल को और नहीं रोक सकता..."

उसी क्षण... भ्रमलोक

विशाल काला सर्प...
सर्पराज के सामने अपना फन झुकाकर खड़ा था।
उसकी लाल आँखें स्थिर थीं।
"जीवित बचना चाहते हो?"
उसने पूछा।
"हाँ।"
सर्पराज ने बिना झिझक उत्तर दिया।
"तो मुझसे युद्ध मत करो।"
यह उत्तर अप्रत्याशित था।
"युद्ध नहीं?"
"तुम हर उस चीज़ से लड़ना चाहते हो..."
"जो तुम्हारे सामने खड़ी हो।"
"लेकिन..."
"भ्रम को तलवार से नहीं हराया जाता।"
इतना कहकर विशाल सर्प ने अपनी पूँछ से ज़मीन पर प्रहार किया।
पूरा भ्रमलोक टूटने लगा।
धुएँ के महल...
मृत सैनिक...
सिंहासन...
सब काँच की तरह बिखरने लगे।
रहस्यमयी पुरुष पहली बार क्रोधित हुआ।
"तुम ऐसा नहीं कर सकते!"
विशाल सर्प की गर्जना पूरी दुनिया में गूँज उठी।
"यह मेरा उत्तराधिकारी है।"
उस एक वाक्य के साथ...
भ्रमलोक पूरी तरह ढह गया।

वास्तविक दुनिया

सर्पराज की बंद आँखें अचानक खुल गईं।
उसने एक गहरी साँस ली।
उसकी पुतलियाँ फिर सामान्य हो गईं।
लेकिन...
उसी क्षण उसने देखा—
मुहर-भंजक पहली कुंजी लेकर पीछे हट चुका था।
"नहीं!"
सर्पराज पूरी गति से उसकी ओर दौड़ा।
मुहर-भंजक ने कुंजी को अपने सीने पर बने टूटी हुई नाग-मुद्रा के ऊपर रखा।
क्षणभर के लिए...
दोनों प्रतीक एक-दूसरे से टकराए।
फिर...
कुछ ऐसा हुआ जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।
क्र्र्र्राऽऽक!!
टूटी हुई नाग-मुद्रा में दरारें पड़ने लगीं।
मुहर-भंजक पीछे हट गया।
उसने पहली बार दर्द से चीख मारी।
कुंजी...
उसे स्वीकार नहीं कर रही थी।
रक्षक चिल्लाया—
"उसे छूकर रखो!"
"कुंजी अपने वास्तविक धारक को पहचान लेगी!"
सर्पराज ने बिना देर किए छलाँग लगाई।
हवा में...
उसका हाथ और कुंजी...
दोनों एक-दूसरे की ओर बढ़े।
जैसे ही उसकी उँगलियाँ कुंजी से टकराईं...
पूरी भूलभुलैया नीले प्रकाश से भर गई।
ध्वाऽऽऽऽम!!
एक ऊर्जा-विस्फोट हुआ।
तीनों मुहर-भंजक कई मीटर दूर जा गिरे।
सर्पराज के चारों ओर सात नीले ऊर्जा-वृत्त घूमने लगे।
पहली कुंजी...
धीरे-धीरे पिघलकर प्रकाश में बदलने लगी।
वह प्रकाश...
सीधे सर्पराज की हथेली पर बने नाग-चिह्न में समा गया।
"यह क्या हुआ?"
सर्पराज ने आश्चर्य से पूछा।
रक्षक मुस्कुराया।
"अब..."
"कुंजी बाहर की वस्तु नहीं रही।"
"यह तुम्हारे भीतर सुरक्षित है।"
"अब कोई इसे तुमसे छीन नहीं सकता..."
उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि...
पूरी भूलभुलैया ज़ोर से काँप उठी।
दीवारें फटने लगीं।
छत के विशाल पत्थर गिरने लगे।
ऋषि वासुकिरत्न ने गंभीर स्वर में कहा—
"उन्होंने देर कर दी..."
"पहली कुंजी तो नहीं मिली..."
"लेकिन उन्होंने भूलभुलैया की मुख्य मुहर तोड़ दी है।"
अचानक...
सबसे पीछे की विशाल दीवार विस्फोट के साथ टूट गई।
घने धुएँ के बीच...
एक विशाल आकृति धीरे-धीरे बाहर आई।
वह तीनों मुहर-भंजकों से भी ऊँची थी।
लगभग बीस फ़ीट।
काले कवच पर प्राचीन नाग-लिपि उकेरी हुई थी।
चेहरा पूरी तरह मुखौटे से ढका था।
उसकी पीठ पर बँधी तलवार...
साधारण तलवार नहीं थी—
उसकी धार से लगातार काला धुआँ निकल रहा था।
तीनों मुहर-भंजक...
जो अब तक किसी के सामने नहीं झुके थे...
एक साथ घुटनों पर बैठ गए।
उन्होंने सिर झुकाकर कहा—
"स्वामी..."
विशाल योद्धा की नज़र...
सीधे सर्पराज पर जाकर ठहर गई।
और उसने पहली बार कहा—
"अंततः..."
"नागवंश का अंतिम उत्तराधिकारी..."
"मेरे सामने है।"
पूरी भूलभुलैया सन्नाटे में डूब गई।
तीनों मुहर-भंजक अब भी घुटनों के बल झुके हुए थे।
उनकी लाल आँखों में पहली बार भय दिखाई दे रहा था।
बीस फ़ीट ऊँचा वह रहस्यमयी योद्धा...
टूटी हुई दीवार के बीच खड़ा था।
उसके चारों ओर काला धुआँ गोलाकार घूम रहा था।
उसकी तलवार अभी भी म्यान में थी।
फिर भी...
केवल उसकी उपस्थिति से पत्थर की ज़मीन दरकने लगी।
रक्षक ने धीरे-धीरे अपना सिर झुका लिया।
उसकी भारी आवाज़ पहली बार काँपी।
"सेनापति..."
सर्पराज ने उसकी ओर देखा।
"तुम इसे जानते हो?"
रक्षक ने उत्तर दिया—
"जानता नहीं..."
"...कभी इसके अधीन युद्ध लड़ा था।"
सर्पराज की आँखें फैल गईं।
"क्या?"
सेनापति ने पहली बार बोलना शुरू किया।
उसकी आवाज़ किसी गुफा में गूँजती गर्जना जैसी थी।
"बहुत समय बाद..."
"नागऋषियों का कोई उत्तराधिकारी..."
"पहली कुंजी तक पहुँचा है।"
उसने धीरे-धीरे अपना दायाँ हाथ उठाया।
उसकी उँगलियों के बीच काला धुआँ इकट्ठा होने लगा।
"कुंजी..."
"अब तुम्हारे भीतर है।"
"तो तुम्हें ही लेकर जाना होगा।"
उसने तलवार अब भी नहीं निकाली।
बस अपनी तर्जनी आगे बढ़ाई।
अचानक...
सर्पराज के सीने में तीव्र जलन हुई।
हथेली पर बना नाग-चिह्न प्रचंड गति से चमकने लगा।
"आह...!"
सर्पराज घुटनों पर आ गया।
उसे लगा मानो किसी ने उसके शरीर के भीतर से पहली कुंजी को खींचना शुरू कर दिया हो।
ऋषि वासुकिरत्न तुरंत आगे आए।
उन्होंने अपना दंड भूमि पर टिकाया।
धम्म!
नीले मंत्रचक्र पूरे कक्ष में फैल गए।
काली शक्ति और नीली शक्ति आपस में टकराईं।
पूरा कक्ष काँप उठा।
सेनापति ने पहली बार आश्चर्य से ऋषि की ओर देखा।
"तुम्हारी चेतना..."
"अब तक जीवित है?"
ऋषि शांत स्वर में बोले—
"जब तक भूलभुलैया जीवित है..."
"मैं भी हूँ।"
सेनापति ने हल्की-सी हँसी हँसी।
"तो पहले..."
"भूलभुलैया को ही समाप्त कर देता हूँ।"
उसने अपनी तलवार की मूठ पकड़ ली।
रक्षक चीख उठा—
"नहीं!"
लेकिन...
देर हो चुकी थी।
श्श्श्ह्ह्ह...
तलवार कुछ इंच ही म्यान से बाहर निकली।
बस उतना ही...
और पूरा कक्ष अंधकार में डूब गया।
दूर-दूर तक फैली दीवारों में एक साथ दरारें पड़ गईं।
लावा की नदियाँ दिशा बदलने लगीं।
ऊपर की छत से विशाल शिलाखंड गिरने लगे।
ऋषि वासुकिरत्न का प्रकाश अचानक आधा रह गया।
"यह असंभव है..."
उन्होंने धीमे स्वर में कहा।
"सिर्फ़ तलवार की आभा से..."
"भूलभुलैया का संतुलन टूट रहा है..."
सर्पराज धीरे-धीरे उठ खड़ा हुआ।
उसने दर्द सहते हुए तलवार संभाली।
"अगर इसे यहीं नहीं रोका..."
"तो पहली कुंजी बच भी गई..."
"तो भी भूलभुलैया नष्ट हो जाएगी।"
सेनापति ने पहली बार अपनी दृष्टि सीधे सर्पराज पर टिकाई।
"तुम युद्ध करना चाहते हो?"
उसने तलवार पूरी तरह नहीं निकाली।
बल्कि...
अपना बायाँ हाथ आगे बढ़ाया।
क्षणभर में...
काले धुएँ से एक विशाल वृत्त बना।
उस वृत्त के भीतर...
सैकड़ों युद्धभूमियों के दृश्य दिखाई देने लगे।
टूटे हुए राज्य।
जलते हुए नगर।
गिरते हुए नागध्वज।
फिर...
सभी दृश्य एक स्थान पर आकर रुक गए।
सर्पराज ने देखा...
उस दृश्य में वही रहस्यमयी कैदी था...
जो विस्मृत द्वार के पीछे कैद था।
लेकिन...
वह अकेला नहीं था।
उसके सामने...
सात योद्धा खड़े थे।
सातों के हाथों में अलग-अलग दिव्य अस्त्र थे।
और उनमें से एक...
बिल्कुल सर्पराज जैसा दिख रहा था।
सेनापति की आवाज़ फिर गूँजी—
"जिसे तुम भविष्य समझते हो..."
"वह अतीत है।"
"और जिसे तुम बचाना चाहते हो..."
"वह पहले ही एक बार नष्ट हो चुका है।"
सर्पराज कुछ समझ पाता...
उससे पहले ही...
भूलभुलैया के सबसे भीतर से एक प्रचंड गर्जना सुनाई दी।
पूरी ज़मीन हिल उठी।
ऋषि वासुकिरत्न का चेहरा गंभीर हो गया।
उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा—
"नहीं..."
"उन्होंने तीसरी परत भी जगा दी..."
अगले ही क्षण...
भूलभुलैया की गहराइयों से...
हजारों नीली आँखें एक साथ खुल गईं।
भूलभुलैया की गहराइयों में...
हजारों नीली आँखें एक साथ खुल चुकी थीं।
कुछ ही क्षणों बाद...
अंधकार के भीतर से भारी साँसों की आवाज़ आने लगी।
ऐसा लग रहा था...
मानो सदियों से सोई हुई कोई सेना जाग उठी हो।
रक्षक का चेहरा कठोर हो गया।
उसने तुरंत सर्पराज की ओर देखा।
"सुनो!"
"अब जो होने वाला है..."
"वह इस भूलभुलैया के नियमों से भी बाहर है।"
"ये कौन हैं?"
सर्पराज ने पूछा।
रक्षक ने गहरी साँस ली।
"तीसरी परत के रक्षक..."
"जिन्हें केवल अंतिम संकट में जगाया जाता था।"
धीरे-धीरे...
अंधेरे गलियारे से पहली आकृति बाहर आई।
वह मनुष्य नहीं थी।
उसका शरीर पत्थर और नीले स्फटिक से बना था।
लगभग पंद्रह फ़ीट ऊँची।
चार भुजाएँ।
प्रत्येक हाथ में अलग हथियार—
तलवार...
भाला...
चक्र...
और विशाल ढाल।
उसके पीछे...
दूसरी।
फिर तीसरी।
फिर चौथी।
कुछ ही क्षणों में...
बारह विशाल रक्षक कक्ष के चारों ओर खड़े हो गए।
लेकिन...
उन्होंने किसी पर हमला नहीं किया।
उनकी सभी आँखें...
एक साथ...
मुहर-भंजकों के सेनापति पर टिक गईं।
सेनापति हल्का-सा मुस्कुराया।
"अभी भी..."
"तुम लोग अपने कर्तव्य से बँधे हुए हो।"
उसने अपनी तलवार एक इंच और बाहर निकाली।
श्श्श्ह्ह...
काली ऊर्जा पूरे कक्ष में फैल गई।
बारहों रक्षकों ने एक साथ अपने हथियार उठा लिए।
धाऽऽऽम!
उनकी ढालें ज़मीन से टकराईं।
पूरा कक्ष नीली ऊर्जा से भर गया।
रक्षक चिल्लाया—
"सर्पराज!"
"जब तक वे सेनापति को रोक रहे हैं..."
"तुम्हें आगे बढ़ना होगा!"
"लेकिन पहली मुहर?"
रक्षक ने सामने की दीवार की ओर इशारा किया।
वहाँ...
एक विशाल नाग-प्रतिमा खड़ी थी।
अब उसकी आँखें खुल चुकी थीं।
उसके खुले हुए मुख के भीतर...
नीली रोशनी से बना एक मार्ग दिखाई दे रहा था।
"असली पहली मुहर..."
"उस मार्ग के अंत में है।"
सर्पराज बिना देर किए दौड़ पड़ा।
उसी क्षण...
मुहर-भंजकों में से एक ने उसका रास्ता रोक लिया।
वह कुल्हाड़ी वाला योद्धा था।
उसने ज़ोरदार वार किया।
ठाऽऽङ्ग!
सर्पराज ने तलवार से रोका।
इस बार...
वह पीछे नहीं हटा।
पहली कुंजी अब उसके भीतर समा चुकी थी।
उसकी गति पहले से कहीं अधिक तेज़ हो चुकी थी।
उसने तुरंत घूमकर दूसरा वार किया।
छन्न!
पहली बार...
मुहर-भंजक के कवच पर गहरी दरार पड़ गई।
योद्धा कुछ कदम पीछे हट गया।
उसने आश्चर्य से अपने टूटे हुए कवच को देखा।
"कुंजी..."
उसने बुदबुदाया।
"...धारक को शक्ति दे रही है।"
सर्पराज आगे बढ़ने ही वाला था कि...
पीछे से भयंकर विस्फोट हुआ।
उसने मुड़कर देखा।
बारह प्राचीन रक्षक...
एक साथ सेनापति पर टूट पड़े थे।
चक्र घूम रहे थे।
भाले चमक रहे थे।
तलवारें बिजली की तरह बरस रही थीं।
लेकिन...
सेनापति अब भी अपनी तलवार पूरी तरह नहीं निकाल रहा था।
वह केवल...
एक हाथ से सभी वार रोक रहा था।
धाऽऽङ्ग!
पहले रक्षक की तलवार टूट गई।
भूऊऊम!
दूसरा रक्षक दीवार में जा टकराया।
तीसरे का चक्र...
हवा में ही दो टुकड़ों में बँट गया।
कुछ ही साँसों में...
बारह में से छह रक्षक ज़मीन पर गिर चुके थे।
ऋषि वासुकिरत्न की आवाज़ काँप उठी।
"असंभव..."
"वह..."
"अपनी वास्तविक शक्ति का उपयोग भी नहीं कर रहा।"
सेनापति ने पहली बार ऊँची आवाज़ में कहा—
"मैं यहाँ युद्ध करने नहीं आया।"
"मैं केवल..."
"उत्तराधिकारी की परीक्षा लेने आया हूँ।"
उसने अपनी उँगली सीधी सर्पराज की ओर उठा दी।
"यदि तुम सचमुच नागवंश के अंतिम उत्तराधिकारी हो..."
"तो पहली मुहर लेकर बाहर निकलो।"
"और यदि असफल हुए..."
उसकी आँखों में लाल प्रकाश चमका।
"तो यह भूलभुलैया..."
"तुम्हारी समाधि बन जाएगी।"
उसी क्षण...
नाग-प्रतिमा के भीतर का नीला मार्ग तेज़ी से बंद होने लगा।
रक्षक पूरी ताकत से चिल्लाया—
"सर्पराज! अभी!"
सर्पराज ने बिना पीछे देखे...
अपनी पूरी गति से छलाँग लगाई...
और बंद होते मार्ग के भीतर प्रवेश कर गया।
उसके पीछे...
पत्थर का विशाल मुख पूरी तरह बंद हो गया।
अब...
वह अकेला था।
और सामने...
नीली रोशनी से जगमगाता एक प्राचीन गलियारा...
जिसके अंत में...
कुछ धड़क रहा था।
नीले प्रकाश से भरा वह प्राचीन गलियारा...
पूरी तरह शांत था।
न हवा...
न कोई आवाज़...
सिर्फ़ एक नियमित धड़कन—
धक...
धक...
धक...
हर धड़कन के साथ पूरी दीवारों पर बने नाग-चिह्न चमक उठते।
सर्पराज सावधानी से आगे बढ़ा।
कुछ ही कदम बाद...
उसे एहसास हुआ कि धड़कन बाहर से नहीं...
उसकी अपनी हथेली से आ रही है।
पहली कुंजी...
जो उसके भीतर समा चुकी थी...
अब उसी लय में धड़क रही थी।
"क्या यह..."
वह कुछ सोच ही रहा था कि...
गलियारे की दीवारें बदलने लगीं।
पत्थर पिघलने लगे।
उनकी जगह...
चलती हुई चित्रकथाएँ उभर आईं।
पहले दृश्य में...
सात योद्धा एक वृत्त बनाकर खड़े थे।
उनके बीच...
एक प्रकाश-पुंज था।
दूसरे दृश्य में...
उसी प्रकाश-पुंज को सात भागों में विभाजित किया गया।
हर योद्धा एक भाग लेकर अलग दिशा में चला गया।
तीसरे दृश्य में...
एक भयानक युद्ध।
आकाश जल रहा था।
धरती फट चुकी थी।
और...
वही विशाल कैदी...
जिसका हाथ विस्मृत द्वार से बाहर निकल रहा था...
सातों योद्धाओं से युद्ध कर रहा था।
सर्पराज रुक गया।
"ये..."
"क्या यही सात मुहरों की उत्पत्ति है?"
जैसे ही उसने यह कहा...
दीवारों के सभी दृश्य गायब हो गए।
उसकी जगह...
एक गहरी आवाज़ गूँजी—
"तुम्हें देखने का अधिकार मिला है..."
"समझने का नहीं।"
गलियारे के अंत में...
एक गोलाकार कक्ष खुल गया।
उस कक्ष के बीचों-बीच...
हवा में तैरता हुआ एक नीला क्रिस्टल था।
लेकिन...
वह पहली मुहर नहीं थी।
क्रिस्टल के चारों ओर...
सात धातु के वलय घूम रहे थे।
हर वलय पर अलग-अलग नाग-लिपि अंकित थी।
सर्पराज जैसे ही आगे बढ़ा...
सभी वलय एक साथ घूमने लगे।
घर्ररर...
पूरे कक्ष में यांत्रिक ध्वनि गूँज उठी।
तभी...
फ़र्श पर सात वृत्त उभर आए।
और उन सातों वृत्तों से...
सात प्रकाशमान योद्धा प्रकट हुए।
उनके शरीर पूरी तरह ऊर्जा से बने थे।
चेहरे स्पष्ट नहीं थे।
लेकिन...
हर एक के हाथ में अलग दिव्य अस्त्र था।
पहले के पास धनुष।
दूसरे के पास त्रिशूल।
तीसरे के पास तलवार।
चौथे के पास गदा।
पाँचवें के पास चक्र।
छठे के पास भाला।
और...
सातवें के हाथ खाली थे।
सर्पराज की नज़र उसी सातवें योद्धा पर टिक गई।
उसकी हथेली पर...
वही नाग-चिह्न चमक रहा था।
सातों योद्धाओं ने एक साथ अपनी हथेलियाँ आगे बढ़ाईं।
पूरा कक्ष उनकी आवाज़ से गूँज उठा—
"पहली मुहर का अधिकारी..."
"अपनी पहचान सिद्ध करो।"
इतना कहते ही...
सातों योद्धा बिजली की गति से अलग-अलग दिशाओं में फैल गए।
पहले ने धनुष से प्रकाश-बाण छोड़ा।
दूसरे का त्रिशूल सीधे ऊपर से गिरा।
तीसरे की तलवार सामने से आई।
बाकी चार...
क्षणभर में गायब हो गए।
सर्पराज ने पहला बाण रोका।
ठाऽऽङ्ग!
लेकिन उसी क्षण...
त्रिशूल उसके ठीक पीछे आ गिरा।
पत्थर फट गया।
वह पलटा ही था कि...
तलवारधारी योद्धा सामने पहुँच चुका था।
तीन वार...
लगातार...
बिना रुके।
सर्पराज ने किसी तरह उन्हें रोका।
लेकिन...
उसने महसूस किया—
ये योद्धा एक-दूसरे से स्वतंत्र नहीं लड़ रहे।
उनके हर आक्रमण में...
पूर्ण तालमेल था।
अचानक...
उसकी गर्दन पर ठंडी हवा लगी।
उसने तुरंत झुककर बचाव किया।
स्विश्श!
एक अदृश्य चक्र उसके सिर के ऊपर से निकल गया।
"चार कहाँ हैं?"
सर्पराज ने चारों ओर देखा।
उत्तर अगले ही क्षण मिला।
पीछे...
दोनों ओर...
और ठीक ऊपर...
चार अलग-अलग अस्त्र एक साथ उसकी ओर बढ़ रहे थे।
वह पहली बार पूरी तरह घिर चुका था।
उसी समय...
उसकी हथेली का नाग-चिह्न फिर चमका।
और उसके मन में...
रक्षक के अंतिम शब्द गूँज उठे—
"पहली कुंजी तुम्हें शक्ति नहीं..."
"मार्ग दिखाएगी।"
सर्पराज ने आँखें बंद कर लीं।
उसने हमला रोकने की कोशिश नहीं की।
बल्कि...
पहली बार...
पहली कुंजी की धड़कन पर अपना ध्यान केंद्रित किया।
पूरा कक्ष नीली रोशनी से भरने लगा...
और सातों योद्धा...

एक साथ ठिठक गए।